Thursday, 30 June 2016

पतंग बाज़ी के लिये पहली बार घर से अकेला चल पड़ा दिल्ली से हरिद्वार


आज से लगभघ 9 साल पहले जब मैं 8वीं कक्षा में था, तब पतंबाज़ी का बहुत शौक था। पतंग की उड़ान के साथ मेरे दिल के अरमान भी लंबी उड़ान भरने के लिये तैयार हो रहे थे। छोटी सी उम्र में ही बहुत बड़े बड़े पेच्चे बाज़ मेरे आगे टिक नहीं पाते थे। मेरी पतंग के मांझे की धार और तलवार की धार मानों एक हो, शायद इसीलिए मेरी पतंग के आगे किसी की पतंग टिक नहीं पाती थी। पहले सुना था बड़े-बड़े पेच्चे बाज़ दूर दूर पतंग के पेंच लड़ाने जाते है। तो मैंने भी सोचा इस बार मैं भी जाऊंगा बसंत पंचमी पर हरिद्वार। पश्चमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बसंत पंचमी को बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। लोग वसंत ऋतु का स्वागत सरस्वती पूजा के साथ पतंग उडा कर भी करते है।


वैसे तो हरिद्वार में मेरा ननिहाल भी है तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं थी।लेकिन अभी घर में से किसी का भी हरिद्वार जाने का कार्यक्रम नहीं है, फिर भी मैंने अपनी मम्मी से हरिद्वार अकेले जाने के लिये पूछा तो उन्होंने ये कह कर मना कर दिया के अभी तू छोटा है।


माँ का दिल तो अपने बच्चे की खुशी के लिए तो सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। मेरे फिर दोबारा आग्रह करने पर मम्मी ने कहा चल मैं तेरे साथ चलूंगी। लेकिन मन तो बस आज़ाद पंछी की तरह उड़ जाने की ललख है, वह तो बस अकेले ही आसमान की सैर करना चाहता है। वह अपने पंखों को तोलना चाहता है के कितनी उड़ान भर पायेगा। फिर मैंने मम्मी से कहा मम्मी अकेले जाऊंगा। देखते है के मैं अकेले हरिद्वार पहुँच पाउँगा या नहीं.?? मम्मी ने कहा बेटा अगर नहीं पहुँच पाया तो मैं दूसरा हितेश कहा से लाऊंगी..?? मैंने माँ की ममता को समझते हुए बात बदलते हुए कहा अरे मम्मी पहुँच जाऊंगा थोडा अच्छा तो सोचो बाबा। एक बार जाने तो दो, रेलवे स्टेशन पर मामा लेने आ जायेंगे।


आखिर मम्मी मान गई 2 दिन बाद बसंत पंचमी है। मुझे आज रात 10:30 बजे मसूरी एक्सप्रेस से निकलना है। आरक्षण भी नहीं हुआ और अभी तो सामान भी पैक नहीं हुआ।

मैंने जल्दी जल्दी अपना सामान पैक किया और मांझे वाली चरखियों का मेरा अलग बेग है उसको साथ में रखा।

पता ही नहीं चला कब शाम के 8 बज गए मम्मी खाना भी बना चुकी थी। थोडा खाना खा के थोडा पैक कर लिया, रास्ते में भूख लग गयी तो काम आ जायेगा।











old-delhi__2011175645पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन


9 बजे घर से निकला पापा भी स्टेशन तक छोड़ने जा रहे थे। बीस मिनट बाद स्टेशन पहुंचे तो बहुत लंबी लाइन थी। मैंने पापा से कहा लाओ पैसे मैं टिकट लेता हूँ। छोटे होने के कारण एक लाइन के बीच में जाकर लग गया और करीब 15 मिनट बाद नम्बर आया। 10 बज चुके थे सही समय से टिकट लेके 16 नम्बर प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतजार करने लगे। थोड़ी देर बाद ट्रेन आयी। मैं ट्रेन में बैठ गया, देखते ही देखते ट्रेन चल पड़ी। मैंने पापा को हाथ हिला कर अभिवादन किया। ट्रेन अब प्लेटफार्म से काफी दूर आ गई थी। और मुझे अभी बैठने के लिए सीट नहीं मिली। थोड़ी देर बाद ऊपर की सीट मिली और मैं सामान साथ में रख कर सो गया। पता ही नहीं चला कब सुबह के 5:30 बज गए थे। ट्रेन रुकी बाहर देखा तो लक्सर स्टेशन आया। हरिद्वार आने में अभी आधा घंटा है। ट्रेन भी काफी खली हो चुकी थी नीचे खिड़की वाली सीट पर बैठ कर तेज़ हवा खाने लगा देखते ही देखते ज्वालापुर स्टेशन आ गया और पता ही नहीं चला कब हरिद्वार आ गया। मामा से पहले ही बात हो गई थी।

 










 haridwar-railway-stationहरिद्वार रेलवे स्टेशन











haridwar_railway_stationप्लेटफॉर्म पर यात्री



 गीता प्रेस की स्टाल के बाहर मिल गए। उनके साथ बाइक पर बैठ कर नानी के घर पहुंचा सबसे राम राम की नाना नानी के पैर छुए और नाश्ता तैयार था नाश्ता करके सो गया।

फिर आँख खुली 1 बजे खाना उठकर खाना खाया और मामा जो पतंग लेके आये थे उनमे कन्ने बाधने लगा।

फिर शाम को वहां के कुछ दोस्तों के लेके दक्ष मंदिर के लिए निकल पड़ा। दक्ष मंदिर नानी के घर से पास ही है पैदल 5-7 मिनट लगते है। मैं कपडे लेके आया था। क्योंकि गंगा में नहाना जो था।










img00165-20121127-1706प्रजापति दक्ष मंदिर











img01590दक्ष मंदिर के घाट पर मैं


नहाने के बाद मंदिर में दर्शन किये। और फिर चले गए पास ही खेत में जहाँ अमरुद के कई सारे पेड़ थे। वहां कई सारे अमरुद तोड़े पन्नी में भरे खेत से बाहर निकल ही दहे थे हमारे 1 साथी को खेत के मालिक ने पकड़ लिया उसके हिस्से के सारे अमुरुद वही रखवा के उसको छोड़ दिया। मुझे क्या मेरे अमरुद तो मेरे पास है  खाते हुए वापिस घर आ गए। रात हो चुकी थी खाना तैयार था। खाना खाया अभी 9 ही बज रहे थे के नाना कहने लगे चलो भई टीवी बंद करो और सो जाओ। मेरे नाना जल्दी सो जाते है। तो मुझे भी जल्दी सोना पड़ा। पर नींद कहा आ रही थी कल बसंत पंचमी जो है बार बार उठकर लाइट जला देता और पतंगों के कन्ने सेट करने लगता। तो नाना ने दांट लगा दी और कहा अब सबह ही उठना है।   ऐसी ही दीवानगी होती है पतंगबाज़ी की। के मुँह ऊपर करके भाग लेते हैं फिर पता ही नहीं चलता कब छत ख़त्म हो गई।

फिर मैं सो गया अब तो सुबह ही उठा 5 बज रहे थे। बिना नहाये धोये चरखी पतंग लेके पहुँच गया छत पर और उडा दी पोने की बड़ी पतन इतनी लंबी करली थी के 1 रील ख़त्म ही होने वाली थी। धीरे धीरे पेंच लड़ने शुरू हुए। जिस छत पर मैं था वहां से तो बस एक ही आवाज गूंज रही थी। ('आई बो, वो कांटा') एक में बाद 12 पतंग एक पतंग से काटी। फिर अचानक किसी ने लंगड़ डाल दिया और पतंग टूट गयी। बड़ा दुःख हुआ पतंग को टूटते हुए देखकर। जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गई उसको ही देखता रहा फिर निचे जाकर खाना खाया नहाया धोया। अब धुप हो रही थी सोचा शाम को उड़ाउंगा पतंग। इतने मां मामी से बात की ऑफ थोड़ी देर बाद सो गया फिर शाम को उडा दी पतंग, यह भी काफी लंबी करदी उससे 8 पेंच काटे फिर यह पतंग कट गई। और मैं निचे आ गया। और खाना खा पी के अपना सामान सारा सेट किया जो दिल्ली से लेके आया था। क्योंकि सुबह जन शताब्दी एक्सप्रेस से वापिस अपने घर दिल्ली जो आना है। इस बार आरक्षण मामा ने पहले ही करवा दिया था। बस सुबह 4:30 उठा नहाया धोया फिर मामा के साथ चल पड़ा स्टेशन ठीक 6:20 पर ट्रेन आई और 6:25 पर चल पड़ी और मैं दिल्ली आ गया।

बस इतनी सी थी ये कहानी।

पतंग बाज़ी के लिये पहली बार घर से अकेला चल पड़ा दिल्ली से हरिद्वार

आज से लगभघ 9 साल पहले जब मैं 8वीं कक्षा में था, तब पतंबाज़ी का बहुत शौक था। पतंग की उड़ान के साथ मेरे दिल के अरमान भी लंबी उड़ान भरने के लिये तैयार हो रहे थे। छोटी सी उम्र में ही बहुत बड़े बड़े पेच्चे बाज़ मेरे आगे टिक नहीं पाते थे। मेरी पतंग के मांझे की धार और तलवार की धार मानों एक हो, शायद इसीलिए मेरी पतंग के आगे किसी की पतंग टिक नहीं पाती थी। पहले सुना था बड़े-बड़े पेच्चे बाज़ दूर दूर पतंग के पेंच लड़ाने जाते है। तो मैंने भी सोचा इस बार मैं भी जाऊंगा बसंत पंचमी पर हरिद्वार। पश्चमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बसंत पंचमी को बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। लोग वसंत ऋतु का स्वागत सरस्वती पूजा के साथ पतंग उडा कर भी करते है।

वैसे तो हरिद्वार में मेरा ननिहाल भी है तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं थी।लेकिन अभी घर में से किसी का भी हरिद्वार जाने का कार्यक्रम नहीं है, फिर भी मैंने अपनी मम्मी से हरिद्वार अकेले जाने के लिये पूछा तो उन्होंने ये कह कर मना कर दिया के अभी तू छोटा है।

माँ का दिल तो अपने बच्चे की खुशी के लिए तो सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। मेरे फिर दोबारा आग्रह करने पर मम्मी ने कहा चल मैं तेरे साथ चलूंगी। लेकिन मन तो बस आज़ाद पंछी की तरह उड़ जाने की ललख है, वह तो बस अकेले ही आसमान की सैर करना चाहता है। वह अपने पंखों को तोलना चाहता है के कितनी उड़ान भर पायेगा। फिर मैंने मम्मी से कहा मम्मी अकेले जाऊंगा। देखते है के मैं अकेले हरिद्वार पहुँच पाउँगा या नहीं.?? मम्मी ने कहा बेटा अगर नहीं पहुँच पाया तो मैं दूसरा हितेश कहा से लाऊंगी..?? मैंने माँ की ममता को समझते हुए बात बदलते हुए कहा अरे मम्मी पहुँच जाऊंगा थोडा अच्छा तो सोचो बाबा। एक बार जाने तो दो, रेलवे स्टेशन पर मामा लेने आ जायेंगे।

आखिर मम्मी मान गई 2 दिन बाद बसंत पंचमी है। मुझे आज रात 10:30 बजे मसूरी एक्सप्रेस से निकलना है। आरक्षण भी नहीं हुआ और अभी तो सामान भी पैक नहीं हुआ।
मैंने जल्दी जल्दी अपना सामान पैक किया और मांझे वाली चरखियों का मेरा अलग बेग है उसको साथ में रखा।
पता ही नहीं चला कब शाम के 8 बज गए मम्मी खाना भी बना चुकी थी। थोडा खाना खा के थोडा पैक कर लिया, रास्ते में भूख लग गयी तो काम आ जायेगा।

पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन
9 बजे घर से निकला पापा भी स्टेशन तक छोड़ने जा रहे थे। बीस मिनट बाद स्टेशन पहुंचे तो बहुत लंबी लाइन थी। मैंने पापा से कहा लाओ पैसे मैं टिकट लेता हूँ। छोटे होने के कारण एक लाइन के बीच में जाकर लग गया और करीब 15 मिनट बाद नम्बर आया। 10 बज चुके थे सही समय से टिकट लेके 16 नम्बर प्लेटफॉर्म पर ट्रेन का इंतजार करने लगे। थोड़ी देर बाद ट्रेन आयी। मैं ट्रेन में बैठ गया, देखते ही देखते ट्रेन चल पड़ी। मैंने पापा को हाथ हिला कर अभिवादन किया। ट्रेन अब प्लेटफार्म से काफी दूर आ गई थी। और मुझे अभी बैठने के लिए सीट नहीं मिली। थोड़ी देर बाद ऊपर की सीट मिली और मैं सामान साथ में रख कर सो गया। पता ही नहीं चला कब सुबह के 5:30 बज गए थे। ट्रेन रुकी बाहर देखा तो लक्सर स्टेशन आया। हरिद्वार आने में अभी आधा घंटा है। ट्रेन भी काफी खली हो चुकी थी नीचे खिड़की वाली सीट पर बैठ कर तेज़ हवा खाने लगा देखते ही देखते ज्वालापुर स्टेशन आ गया और पता ही नहीं चला कब हरिद्वार आ गया। मामा से पहले ही बात हो गई थी।
हरिद्वार रेलवे स्टेशन

प्लेटफॉर्म पर यात्री


 गीता प्रेस की स्टाल के बाहर मिल गए। उनके साथ बाइक पर बैठ कर नानी के घर पहुंचा सबसे राम राम की नाना नानी के पैर छुए और नाश्ता तैयार था नाश्ता करके सो गया।
फिर आँख खुली 1 बजे खाना उठकर खाना खाया और मामा जो पतंग लेके आये थे उनमे कन्ने बाधने लगा।
फिर शाम को वहां के कुछ दोस्तों के लेके दक्ष मंदिर के लिए निकल पड़ा। दक्ष मंदिर नानी के घर से पास ही है पैदल 5-7 मिनट लगते है। मैं कपडे लेके आया था। क्योंकि गंगा में नहाना जो था।
प्रजापति दक्ष मंदिर

दक्ष मंदिर के घाट पर मैं

नहाने के बाद मंदिर में दर्शन किये। और फिर चले गए पास ही खेत में जहाँ अमरुद के कई सारे पेड़ थे। वहां कई सारे अमरुद तोड़े पन्नी में भरे खेत से बाहर निकल ही दहे थे हमारे 1 साथी को खेत के मालिक ने पकड़ लिया उसके हिस्से के सारे अमुरुद वही रखवा के उसको छोड़ दिया। मुझे क्या मेरे अमरुद तो मेरे पास है  खाते हुए वापिस घर आ गए। रात हो चुकी थी खाना तैयार था। खाना खाया अभी 9 ही बज रहे थे के नाना कहने लगे चलो भई टीवी बंद करो और सो जाओ। मेरे नाना जल्दी सो जाते है। तो मुझे भी जल्दी सोना पड़ा। पर नींद कहा आ रही थी कल बसंत पंचमी जो है बार बार उठकर लाइट जला देता और पतंगों के कन्ने सेट करने लगता। तो नाना ने दांट लगा दी और कहा अब सबह ही उठना है।   ऐसी ही दीवानगी होती है पतंगबाज़ी की। के मुँह ऊपर करके भाग लेते हैं फिर पता ही नहीं चलता कब छत ख़त्म हो गई।
फिर मैं सो गया अब तो सुबह ही उठा 5 बज रहे थे। बिना नहाये धोये चरखी पतंग लेके पहुँच गया छत पर और उडा दी पोने की बड़ी पतन इतनी लंबी करली थी के 1 रील ख़त्म ही होने वाली थी। धीरे धीरे पेंच लड़ने शुरू हुए। जिस छत पर मैं था वहां से तो बस एक ही आवाज गूंज रही थी। ('आई बो, वो कांटा') एक में बाद 12 पतंग एक पतंग से काटी। फिर अचानक किसी ने लंगड़ डाल दिया और पतंग टूट गयी। बड़ा दुःख हुआ पतंग को टूटते हुए देखकर। जब तक आँखों से ओझल नहीं हो गई उसको ही देखता रहा फिर निचे जाकर खाना खाया नहाया धोया। अब धुप हो रही थी सोचा शाम को उड़ाउंगा पतंग। इतने मां मामी से बात की ऑफ थोड़ी देर बाद सो गया फिर शाम को उडा दी पतंग, यह भी काफी लंबी करदी उससे 8 पेंच काटे फिर यह पतंग कट गई। और मैं निचे आ गया। और खाना खा पी के अपना सामान सारा सेट किया जो दिल्ली से लेके आया था। क्योंकि सुबह जन शताब्दी एक्सप्रेस से वापिस अपने घर दिल्ली जो आना है। इस बार आरक्षण मामा ने पहले ही करवा दिया था। बस सुबह 4:30 उठा नहाया धोया फिर मामा के साथ चल पड़ा स्टेशन ठीक 6:20 पर ट्रेन आई और 6:25 पर चल पड़ी और मैं दिल्ली आ गया।
बस इतनी सी थी ये कहानी।

Friday, 24 June 2016

स्वर्ग सरीखा श्रीनगर शहर





इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें।


1 जुलाई 2015 सुबह 6 बज रहे है। ठण्ड बहुत हो रही है, रात में नींद काफी अच्छी आई सोते समय रिज़ाई की जरुरत पड़ी लेकिन हमारी सारी थकान दूर हो चुकी है। अभी सो कर उठे ही थे के आंटी चाय लेकर आयी, चाय टेबल पर रखते हुई बोली यहाँ 5 किलोमीटर की दुरी में ही आसपास कई सारी जगह है घूमने की, मैंने अपने भाई को बोल दिया है वह आपको 9 बजे यह सब जगह घुमाने लेकर चला जायेगा मैंने उत्सुकता से पूछा आंटी कहाँ-कहाँ लेकर जायेंगे..?? वह बोली यहाँ पास में ही डल गेट, लाल चौक, लाल चौक पर हनुमान मंदिर, कश्मीर विश्वविद्यालय, मुग़ल गार्डन, जम्मू-कश्मीर विधानसभा आदि कई जगह है, वह लेकर चला जायेगा


अगर अंकल नहीं होते तो हमे यह सब घूमने में कितनी समस्या होती न जाने कितने पैसे खर्च हो जाते पर पैसे खर्च करने के बाद भी उतना अच्छे से यह सब घूम नहीं पाते कश्मीर घूमने का आंनद कई ज्यादा गुना बढ़ जाता है अगर रुकने खाने की व्यवस्था हो जाये तो पर यहाँ तो रुकने, खाने के साथ कश्मीर घूमाने की व्यवस्था  हो गई। बातों बातों में पता ही नहीं चला कब 8 बज गये, हम जल्दी से 1 घण्टे तैयार हुए और 9 बजे आंटी के भाई गाडी के साथ बिलकुल तैयार खड़े है। हम उनके साथ बैठे और चल पड़े, देखते है अब यह हमे कहाँ कहाँ लेकर जाते है..!!!










img_20160624_124156_597अंकल के घर में मैं

 

अरे यार अंकित यह क्या..!! यहाँ सड़क कितनी साफ़ है। मैंने अंकित से कहा। तभी अंकल के साले साहब बोल पड़े यहाँ कोई सड़क पर गंदगी नहीं करता कूड़ा कूड़ेदान में ही डालते है, और यहाँ प्रदुषण भी नहीं है। ऐसी सामान्य बातें करते करते हम सबसे पहले कश्मीर विश्वविद्यालय पहुंचे। जहाँ बड़े बड़े अक्षरों में ध्येय वाक्य लिखा है, तमसो मा ज्योर्तिगमय यह देखकर हम अचंभित हो गये यह देखकर। यह वाक्य तो हमारे वेदों में लिखा है..!! पर यह हमारे देश की संस्कृति है, हमारे देश की विरासत है, अच्छी बात अपनाने का हर किसी को बराबर हक़ है। फिर चाहे वह किसी भी जाती, मत, पंथ, सम्प्रदाय से हो। थोड़ी देर रुकने के बाद हम चल पड़े आगे की ओर। मुसाफिर तो आगे बढ़ता रहता है, चलता रहता है।











20150701_162219कश्मीर विश्वविद्यालय के बाहर मैं














img_20150702_115600728_hdrअंकल की कार में हम




 

कुछ देर बाद हम पहुंचे निशात बाग़। यह बाग, डल झील के पूर्वी तरफ स्थित है, जिसे 1633 में हसन आसफ खान, मुमताज महल के पिता और नूर जहान के भाई द्वारा बनाया गया था। निशात बाग का अर्थ होता है खुशियों का बगीचा। इस गार्डन में फूलों की दुर्लभ प्रजातियां, चिनार वृक्ष और सरू के पेड़ भी पाएं जाते हैं।यह मुगल गार्डन, क्षेत्र का सबसे बड़ा सीढ़ीदार उद्यान है। यहां स्थित सुंदर फव्‍वारों, बड़े से लॉन और खूबसूरत फूलों के कारण यह बगीचा काफी विख्‍यात है। कहा जाता है कि शाहजंहा प्रसिद्ध मुगल सम्राट और अब्दुल हसन आसफ खान का दामाद था और इस बाग को देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ था। इसको देखने के बाद उसने चुपके से यह आशा व्‍यक्‍त की थी कि उसके ससुर उसे यह बाग उपहार में दे दें। बाद में ससुर द्वारा बगीचे को गिफ्ट न करने पर उसने बगीचे में पानी की सप्‍लाई को रूकवा दिया था।



यहाँ आकर ऐसा लगा जैसे कही स्वर्ग में आ गये हो इतनी हरियाली पेड़ और रंग बिरेंगे फूल इस तरह मन मोह रहे थे जैसे इंसान अपनी ज़िन्दगी में किसी के लिए कुछ नहीं बस प्रकृति के लिए उर प्रकृति उसके लिये।













20150701_165213निशात बाग़ का मनमोहक दृश्य और मैं











20150701_164426निशात बाग के बाहर मैं अंकल का बेटा आसिफ और बेटी मदिया











20150701_165544निशात बाग़ में पहाड़ों की गोद में मैं प्रमोद और अंकल के बेटा- बेटी











20150701_170804-2निशात बाग़ के फुआरे के बीच में मैं




अब हम पहुंचे चश्‍म - ए - शाही यह गार्डन, एक प्राचीन उद्यान है जिसे 1632 में स्‍थापित किया गया था। यह श्रीनगर का सबसे छोटा मुगल गार्डन है जिसकी लम्‍बाई 108 मीटर और चौड़ाई 38 मीटर की है। इसके अलावा, इस गार्डन को रॉयल स्प्रिंग के नाम से भी जाना जाता है।  यह गार्डन, जलसेतु, झरने और फव्‍वारे के साथ तीन भागों में बंटा हुआ है। यह गार्डन, नेहरू मेमोरियल पार्क के आसपास के क्षेत्र में स्थित है जहां से हिमालय और डल झील का शानदार दृश्‍य दिखता है। यहां फलों और फूलों की कई दुर्लभ प्रजातियां देखने को मिलती हैं। गार्डन में स्‍वच्‍छ पानी का झरना बहता है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसके पानी में काफी मात्रा में औषधिय गुण हैं जो स्‍थानीय लोगों को काफी आकर्षित करता है। और यह भी कहा जाता है जब जवाहरलाल नेहरू यहाँ रहते थे तो इस गार्डन से नित्यप्रति पानी पीने के लिये मंगाते थे।





उसके बाद हम डल झील गए यह झील श्रीनगर, कश्मीर में एक प्रसिद्ध झील है। 18 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई यह झील तीन दिशाओं से पहाड़ियों से घिरी हुई है। यह जम्मू-कश्मीर की दूसरी सबसे बड़ी झील है। इसमें सोतों से तो जल आता है साथ ही कश्मीर घाटी की अनेक झीलें आकर इसमें जुड़ती हैं। इसके चार प्रमुख जलाशय हैं गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल तथा नागिन। लोकुट डल के मध्य में रूपलंक द्वीप स्थित है तथा बोड डल जलधारा के मध्य में सोनालंक द्वीप स्थित है। भारत की सबसे सुंदर झीलों में इसका नाम लिया जाता है। पास ही स्थित मुगल वाटिका से डल झील का सौंदर्य अप्रतिम नज़र आता है। पर्यटक जम्मू-कश्मीर आएँ और डल झील देखने न जाएँ ऐसा हो ही नहीं सकता।




डल झील के मुख्य आकर्षण का केन्द्र है यहाँ के शिकारे या हाउसबोट। अब इन शिकारों से हम कैसे अछूते रह सकते थे..? हमने भी शिकारों का खूब आनंद लिया, घंटों तक शिकारे में ही रहे, जिसमे हमारे शिकारे पास चलती फिरती आइसक्रीम की दुकान आई आईसक्रीम का नाम है गुलबदन जितना अच्छा नाम उतनी स्वादिस्ट आईसक्रीम। अब बहुत देर हो चुकी थी समय काफी हो गया है अभी और जगह भी जाना है। मन नहीं कर रहा था जाने का पर हम चल पड़े क्योंकि जन्नत अभी और भी है।











img_20150701_181348890_hdr-1डल झील शिकारे में मैं










img_20150701_180355995_hdrचलती फिरती तैरती गुलबदन आईसक्रीम की दुकान










img_20160624_124516_008गुलबदन आईसक्रीम का मज़ा लेते हुए मैं प्रमोद और अंकित


काफी देर हो गई थी थोड़ी देर में रोज़ा खोलने का समय भी हो रहा था आज अंकल के साले साहब का रोज़ा था तो उसको भी थोड़ी जल्दी थी। अब हम वापिस चल पड़े रास्ते में जम्मू कश्मीर विधानसभा होते हुए सीधे पहुंचे लाल चौक। जी हाँ वही लाल चौक जिसके बारे में काफी कुछ सुनने को मिलता है मीडिया आदि में पर अभी ऐसा कुछ नहीं है बाजार लगा हुआ है बाजार में काफी अच्छी खासी भीड़ है बिलकुल ऐसी ही भीड़ जैसी चांदनी चौक के बाज़ारों में होती है। बाजार से होते हुए हम पंचमुखी हनुमान मंदिर पहुंचे। मंदिर के अंदर जाने के लिए सेना के सुरक्षा घेरे को पार करके जाना पडता है। मंदिर में दर्शन करके मन प्रसन्न हो गया। शाम हो चुकी है, हम काफी थक भी गये है अब सीधे चल पड़े घर की ओर।









 20150701_185049पंच मुखी हनुमान मंदिर के बाहर हम चारों










12-746x500लाल चौक श्रीनगर



अंकल के साले साहब हमे अंकल के घर छोड़ कर अपने घर चले गए। पहुँचते ही पता चला अंकल आंटी ने आज रोज़ा नहीं रखा क्योंकि रोज़े में जिसका रोजा होता है उनके आगे कुछ खाते पीते नहीं है। उनका इतना अपनत्व देखकर बहुत अच्छा लगा पर दुःख इस बात का हुआ हमारी वजह से वह रोज़ा नहीं रख पाये। खैर आंटी ने कश्मीर की मशहूर राज़मा चावल और रोटी बना रखी है। मज़ा आ गया खाकर एकदम लाजवाब। भोजन करने के बाद अंकल के गार्डन में टहले और टहलते टहलते ही विचार बना अमरनाथ जी भी जायेंगे आज का तो सारा दिन निकल गया वहां जाने के लिये रेजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है। यह काम कल करवायेंगे अभी बहुत नींद आ रही है तो हम सो गये।

अगले भाग में जारी...







स्वर्ग सरीखा श्रीनगर शहर

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1 जुलाई 2015 सुबह 6 बज रहे है। ठण्ड बहुत हो रही है, रात में नींद काफी अच्छी आई सोते समय रिज़ाई की जरुरत पड़ी लेकिन हमारी सारी थकान दूर हो चुकी है। अभी सो कर उठे ही थे के आंटी चाय लेकर आयी, चाय टेबल पर रखते हुई बोली यहाँ 5 किलोमीटर की दुरी में ही आसपास कई सारी जगह है घूमने की, मैंने अपने भाई को बोल दिया है वह आपको 9 बजे यह सब जगह घुमाने लेकर चला जायेगा मैंने उत्सुकता से पूछा आंटी कहाँ-कहाँ लेकर जायेंगे..?? वह बोली यहाँ पास में ही डल गेट, लाल चौक, लाल चौक पर हनुमान मंदिर, कश्मीर विश्वविद्यालय, मुग़ल गार्डन, जम्मू-कश्मीर विधानसभा आदि कई जगह है, वह लेकर चला जायेगा

अगर अंकल नहीं होते तो हमे यह सब घूमने में कितनी समस्या होती न जाने कितने पैसे खर्च हो जाते पर पैसे खर्च करने के बाद भी उतना अच्छे से यह सब घूम नहीं पाते कश्मीर घूमने का आंनद कई ज्यादा गुना बढ़ जाता है अगर रुकने खाने की व्यवस्था हो जाये तो पर यहाँ तो रुकने, खाने के साथ कश्मीर घूमाने की व्यवस्था  हो गई। बातों बातों में पता ही नहीं चला कब 8 बज गये, हम जल्दी से 1 घण्टे तैयार हुए और 9 बजे आंटी के भाई गाडी के साथ बिलकुल तैयार खड़े है। हम उनके साथ बैठे और चल पड़े, देखते है अब यह हमे कहाँ कहाँ लेकर जाते है..!!!
अंकल के घर में मैं

अरे यार अंकित यह क्या..!! यहाँ सड़क कितनी साफ़ है। मैंने अंकित से कहा। तभी अंकल के साले साहब बोल पड़े यहाँ कोई सड़क पर गंदगी नहीं करता कूड़ा कूड़ेदान में ही डालते है, और यहाँ प्रदुषण भी नहीं है। ऐसी सामान्य बातें करते करते हम सबसे पहले कश्मीर विश्वविद्यालय पहुंचे। जहाँ बड़े बड़े अक्षरों में ध्येय वाक्य लिखा है, तमसो मा ज्योर्तिगमय यह देखकर हम अचंभित हो गये यह देखकर। यह वाक्य तो हमारे वेदों में लिखा है..!! पर यह हमारे देश की संस्कृति है, हमारे देश की विरासत है, अच्छी बात अपनाने का हर किसी को बराबर हक़ है। फिर चाहे वह किसी भी जाती, मत, पंथ, सम्प्रदाय से हो। थोड़ी देर रुकने के बाद हम चल पड़े आगे की ओर। मुसाफिर तो आगे बढ़ता रहता है, चलता रहता है।
कश्मीर विश्वविद्यालय के बाहर मैं

अंकल की कार में हम

कुछ देर बाद हम पहुंचे निशात बाग़। यह बाग, डल झील के पूर्वी तरफ स्थित है, जिसे 1633 में हसन आसफ खान, मुमताज महल के पिता और नूर जहान के भाई द्वारा बनाया गया था। निशात बाग का अर्थ होता है खुशियों का बगीचा। इस गार्डन में फूलों की दुर्लभ प्रजातियां, चिनार वृक्ष और सरू के पेड़ भी पाएं जाते हैं।यह मुगल गार्डन, क्षेत्र का सबसे बड़ा सीढ़ीदार उद्यान है। यहां स्थित सुंदर फव्‍वारों, बड़े से लॉन और खूबसूरत फूलों के कारण यह बगीचा काफी विख्‍यात है। कहा जाता है कि शाहजंहा प्रसिद्ध मुगल सम्राट और अब्दुल हसन आसफ खान का दामाद था और इस बाग को देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ था। इसको देखने के बाद उसने चुपके से यह आशा व्‍यक्‍त की थी कि उसके ससुर उसे यह बाग उपहार में दे दें। बाद में ससुर द्वारा बगीचे को गिफ्ट न करने पर उसने बगीचे में पानी की सप्‍लाई को रूकवा दिया था।
यहाँ आकर ऐसा लगा जैसे कही स्वर्ग में आ गये हो इतनी हरियाली पेड़ और रंग बिरेंगे फूल इस तरह मन मोह रहे थे जैसे इंसान अपनी ज़िन्दगी में किसी के लिए कुछ नहीं बस प्रकृति के लिए उर प्रकृति उसके लिये।

निशात बाग़ का मनमोहक दृश्य और मैं

निशात बाग के बाहर मैं अंकल का बेटा आसिफ और बेटी मदिया

निशात बाग़ में पहाड़ों की गोद में मैं प्रमोद और अंकल के बेटा- बेटी

निशात बाग़ के फुआरे के बीच में मैं


अब हम पहुंचे चश्‍म - ए - शाही यह गार्डन, एक प्राचीन उद्यान है जिसे 1632 में स्‍थापित किया गया था। यह श्रीनगर का सबसे छोटा मुगल गार्डन है जिसकी लम्‍बाई 108 मीटर और चौड़ाई 38 मीटर की है। इसके अलावा, इस गार्डन को रॉयल स्प्रिंग के नाम से भी जाना जाता है।  यह गार्डन, जलसेतु, झरने और फव्‍वारे के साथ तीन भागों में बंटा हुआ है। यह गार्डन, नेहरू मेमोरियल पार्क के आसपास के क्षेत्र में स्थित है जहां से हिमालय और डल झील का शानदार दृश्‍य दिखता है। यहां फलों और फूलों की कई दुर्लभ प्रजातियां देखने को मिलती हैं। गार्डन में स्‍वच्‍छ पानी का झरना बहता है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसके पानी में काफी मात्रा में औषधिय गुण हैं जो स्‍थानीय लोगों को काफी आकर्षित करता है। और यह भी कहा जाता है जब जवाहरलाल नेहरू यहाँ रहते थे तो इस गार्डन से नित्यप्रति पानी पीने के लिये मंगाते थे।

उसके बाद हम डल झील गए यह झील श्रीनगर, कश्मीर में एक प्रसिद्ध झील है। 18 किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई यह झील तीन दिशाओं से पहाड़ियों से घिरी हुई है। यह जम्मू-कश्मीर की दूसरी सबसे बड़ी झील है। इसमें सोतों से तो जल आता है साथ ही कश्मीर घाटी की अनेक झीलें आकर इसमें जुड़ती हैं। इसके चार प्रमुख जलाशय हैं गगरीबल, लोकुट डल, बोड डल तथा नागिन। लोकुट डल के मध्य में रूपलंक द्वीप स्थित है तथा बोड डल जलधारा के मध्य में सोनालंक द्वीप स्थित है। भारत की सबसे सुंदर झीलों में इसका नाम लिया जाता है। पास ही स्थित मुगल वाटिका से डल झील का सौंदर्य अप्रतिम नज़र आता है। पर्यटक जम्मू-कश्मीर आएँ और डल झील देखने न जाएँ ऐसा हो ही नहीं सकता।

डल झील के मुख्य आकर्षण का केन्द्र है यहाँ के शिकारे या हाउसबोट। अब इन शिकारों से हम कैसे अछूते रह सकते थे..? हमने भी शिकारों का खूब आनंद लिया, घंटों तक शिकारे में ही रहे, जिसमे हमारे शिकारे पास चलती फिरती आइसक्रीम की दुकान आई आईसक्रीम का नाम है गुलबदन जितना अच्छा नाम उतनी स्वादिस्ट आईसक्रीम। अब बहुत देर हो चुकी थी समय काफी हो गया है अभी और जगह भी जाना है। मन नहीं कर रहा था जाने का पर हम चल पड़े क्योंकि जन्नत अभी और भी है।
डल झील शिकारे में मैं

चलती फिरती तैरती गुलबदन आईसक्रीम की दुकान

गुलबदन आईसक्रीम का मज़ा लेते हुए मैं प्रमोद और अंकित

काफी देर हो गई थी थोड़ी देर में रोज़ा खोलने का समय भी हो रहा था आज अंकल के साले साहब का रोज़ा था तो उसको भी थोड़ी जल्दी थी। अब हम वापिस चल पड़े रास्ते में जम्मू कश्मीर विधानसभा होते हुए सीधे पहुंचे लाल चौक। जी हाँ वही लाल चौक जिसके बारे में काफी कुछ सुनने को मिलता है मीडिया आदि में पर अभी ऐसा कुछ नहीं है बाजार लगा हुआ है बाजार में काफी अच्छी खासी भीड़ है बिलकुल ऐसी ही भीड़ जैसी चांदनी चौक के बाज़ारों में होती है। बाजार से होते हुए हम पंचमुखी हनुमान मंदिर पहुंचे। मंदिर के अंदर जाने के लिए सेना के सुरक्षा घेरे को पार करके जाना पडता है। मंदिर में दर्शन करके मन प्रसन्न हो गया। शाम हो चुकी है, हम काफी थक भी गये है अब सीधे चल पड़े घर की ओर।
पंचमुखी हनुमान मंदिर के बाहर हम चारों

लाल चौक श्रीनगर


अंकल के साले साहब हमे अंकल के घर छोड़ कर अपने घर चले गए। पहुँचते ही पता चला अंकल आंटी ने आज रोज़ा नहीं रखा क्योंकि रोज़े में जिसका रोजा होता है उनके आगे कुछ खाते पीते नहीं है। उनका इतना अपनत्व देखकर बहुत अच्छा लगा पर दुःख इस बात का हुआ हमारी वजह से वह रोज़ा नहीं रख पाये। खैर आंटी ने कश्मीर की मशहूर राज़मा चावल और रोटी बना रखी है। मज़ा आ गया खाकर एकदम लाजवाब। भोजन करने के बाद अंकल के गार्डन में टहले और टहलते टहलते ही विचार बना अमरनाथ जी भी जायेंगे आज का तो सारा दिन निकल गया वहां जाने के लिये रेजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है। यह काम कल करवायेंगे अभी बहुत नींद आ रही है तो हम सो गये।

अगले भाग में जारी...







Thursday, 23 June 2016

दिल्ली से श्रीनगर (कश्मीर)


शाम के 5 बज रहे थे 20 जून 2015 का दिन था कश्मीर जाने का मन था सोचा किसी दोस्त को भी साथ ले चलूं।

तभी अंकित को फ़ोन किया और कहा कश्मीर चलेगा क्या..?? बोला यार मेरा भी कई दिन से मन कर रहा है चलते है और दो दोस्तों को भी लेजा सकते है क्या..?? मैंने कहा ठीक है कल मिलते है और फ़ोन काट दिया।


जब अंकित को कल मिला और उसको बताया आजकल अमरनाथ यात्रा चल रही है, 28 जून को मेरा एक दोस्त ट्रक लेकर जायेगा उसी में चलेंगे।

अंकित के मन में प्रश्नो का पहाड़ खड़ा हो गया, बोला तू पागल हो गया क्या, बहुत थक जायेंगे, यार सोना भी नहीं हो पायेगा।


मैंने बस उसे इतना कहा मज़ा आएगा ट्रक में, एक नया अनुभव मिलेगा। वो जाने के लिये तैयार हो गया और उसने अपने दोस्त प्रमोद को फ़ोन किया वह भी जाने के लिये तैयार हो गया, मैंने भी अपने दोस्त कपिल को फोन किया वह भी तैयार हो गया उसने मुझे पहले से ही कह रखा था अगर कही जाने का प्रोग्राम बने तो मुझे जरूर ले चले।

हमने आपस में बात करी 28 जून को सभी गौकुलपुरी चौक मिलेंगे।


यह दिन बड़ी कठिनाई से बीत रहे थे, बार बार मन यही सोच रहा था के कितना रोमांचकारी सफ़र होगा, आखिर मुझे ऐसे सफ़र करने में आंनद भी तो बहुत आता है।

इन प्रश्नो के साथ 7 दिन बीत गए। हम सभी सुबह 8 बजे 28 जून को गोकुलपुरी चौक मिले वहां से मेरे दोस्त के घर गये, जो ट्रक लेके जा रहा था। वहां हमने खाना खाया और चल पड़े 12 बजे।


बहुत धुप थी, पसीने तो पानी की तरह बह रहे थे। लेकिन मन में अलग ही मज़ा था, कुछ अलग ही उत्साह था ऊंचाइयों को छूने का ट्रक वाले को आज का सफ़र सिर्फ जालंधर तक ही तय करना था। थोड़ी देर बातें करने के बाद सब चुप हो गये, शायद सफ़र पसंद नहीं आ रहा था। ऐसा हो भी सकता है क्योंकि इतनी गर्मी और ऊपर से ट्रक में। लेकिन 4:30 बजे अम्बाला पहुंचे तो ट्रक वाले ने वहां ट्रक रोका वहां हमने ढाबे पर चाय नाश्ता किया फिर चल पड़े अब सीधे जालंधर जाके रुके रात के 10 बज रहे थे और भूख भी तो काफी तेज़ लग रही थी।

वहां फिर भोजन किया और ट्रक के सामने सड़क पर चादर बिछा कर सो गए मज़े से। थकावट इतनी थी में नींद में पता ही नही चला कब सुबह के चार बज गए।











जालंधर शहर


इस दिन का सफ़र शुरू हुआ सुबह 5 बजे से करीब 3 घंटे बाद 8 बजे हम पठानकोट पहुंच गए। पठानकोट पहुँचते ही पहाड़ियां दिखने लगी। मौसम भी बहुत सुहाना हो गया था। बहुत देर से चुप रहा अंकित अब बोला यार मज़ा आ रहा है, कसम से क्या ज़िन्दगी है..!! मैं उससे यही सुनना चाहता था। खुले आसमान के नीचे ट्रक की खुली छत ऐसा लग रहा था मानो ट्रक हवा में उड़ रहा हो।

करीब 1 बजे तक हम 'जम्मू' पहुँच गए। आसमान में काले बादलों से घनघोर अँधेरा दिन में ही छा गया, बिजली कड़कने लगी, देखते ही देखते झम-झम कर बारिश शुरू हो गई। ऐसे में ट्रक की रफ़्तार धीमी हो गई थी बारिश इतनी तेज़ थी के थोड़ी देर के लिए जम्मू श्रीनगर राजमार्ग बंद कर दिया था।











जम्मू श्रीनगर राजमार्ग बंद किया


शाम करीब 3:30 बजे बारिश रुकी हम उधमपुर पहुँच गये। धीरे धीरे आसमान हमारे करीब आता जा रहा था, लेकिन आज का सफ़र ट्रक वाले को सिर्फ रामबन तक ही तय करना था। शाम करीब 5:30 बजे हम कुद पहुंचे वहां राजमार्ग पर कुद की मश्हूर 'सोन पापड़ी' (पतीसा) मिलता है थोड़ी देर रुककर उसका स्वाद लिया फिर चल पड़े आगे आसमान की आघोष में शाम 7 बजे तक पटनीटॉप पहुंचे, वहां लंगर में प्रसाद रूपी भोजन किया।

फिर 1 घंटे में हमने पटनीटॉप के मनमोहक पहाड़ियों को अपनी आँखों और कैमरे में कैद कर लिया। मन नहीं कर रहा था वहां से चलने का, ऐसा लग रहा था जैसे वहां कुछ छूट रहा हो पर अभी तो आसमान के और करीब जाना है।












पटनीटॉप पर मैं मैं अंकित प्रमोद और कपिल











पटनीटॉप का एक मनमोहक दृश्य


 अब बहुत थक चुके थे बस यही सोच रहे थे कब आयेगा रामबन, रात हो चुकी थी कुछ दिख भी नहीं रहा था। करीब 10 बजे तक हम रामबन पहुँच गए। हमारे दूसरे दिन की यात्रा पूरी हो गई। वहां देखा तो आर्मी गस्त लगा रही थी आखिर हमारी सुरक्षा का जिम्मा उनके पास है। मैं तो बिना कुछ खाये ही सो गया।

सुबह उठे नहाये धोये, मंदिर में दर्शन किये, लंगर में प्रसाद रूपी नाश्ता किया फिर चल पड़ा हमारा कारवां आसमान की ओर।











रामबन में मैं और प्रमोद











रामबन में मैं


धीरे धीरे हवा में ठंडक बढ़ रही थी धीरे धीरे स्वेटर की जरुरत पड़ने लगी महज डेढ़ घंटे में ट्रक वाला अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गया। लेकिन हमे तो अभी ओर चलना है। मुसाफिर तो बस चलता रहता है, आगे बढ़ता रहता है। ट्रक वाले ने हमे शैतानी नाला छोड़ दिया वहां से हमने सबको राम राम कहके विदाई ली। अब हमे बनिहाल रेलवे स्टेशन जाना है। वहां से करीब 7-8 किलोमीटर नीचे है, आधे घंटे तक कोई गाडी नहीं मिली। फिर मन में किसी से मदद मांगने की सूझी तो हमारी नज़र वहां दौरे पर आये वहां के DC मोहम्द ऐजाज पर पड़ी और उनके पास जाके कहने लगे सर हमें श्रीनगर जाना है ट्रेन से। तो उन्होंने कहा क्यों जाना है श्रीनगर.?? क्या करोगे वहां जाके.?? मैंने कहा वहां मेरे अंकल रहते है उनके घर जायेंगे फिर वहां से घूमने निकलेंगे, अमरनाथ यात्रा पर भी जाना है। उन्होंने फिर कहा क्या नाम हा तुम्हारे अंकल का.?? मैंने कहा गुलाम रसूल खांडे तो वह अचम्भित रह गए जैसे उन्हें जानते हो, कहने लगे उनका कोई फ़ोटो है..?? मैंने दिखा दी अंकल की फ़ोटो। फिर पता चला वह अंकल के दोस्त है।

तो उन्होंने पुलिस की जीप से बनिहाल रेलवे स्टेशन छुड़वाया, मन की खुशी दुगनी हो गई। अंकल श्रीनगर रहते है पर उन्हें लोग इतनी दूर भी जानते है। अंकल कोई नेता नहीं है पर वह एक बड़े व्यवसायी है भवन निर्माण के। अगर वह अंकल को नही जानते होते तो हमे काफी देर हो जाती शायद ट्रेन निकल जाती।




हम स्टेशन पर 2:30 बजे पहुँच गए। एक ट्रेन निकल गई थी। अगली ट्रेन 5 बजकर 10 मिनट पर है, तो हम टिकट लेने खिड़की पर गए तो टिकट देने से मना कर दिया, कहा ट्रेन से 1 घंटे पहले मिलती है यहाँ टिकट। तो फिर हम स्टेशन की खूबसूरती निहारने लगे, गंदगी का कोई नामोनिशान नहीं था, एक दम बढ़िया व्यवस्था स्टेशन भी कोई पर्यटक स्थल से कम नहीं है। पता ही नहीं लगा कब 4:30 बज गए हमने भाग कर जल्दी सी टिकट ली। अरे वाह क्या बात है श्रीनगर लगभघ 80 किलोमीटर दूर है और टिकट सिर्फ 20 रु का, हैरान हो गए फिर सोचा ट्रेन बेकार होगी देर से पहुंचाएगी पर ठीक समय पर ट्रेन आई ऐसा लगा जैसे शताब्दी एक्सप्रेस में बैठे हो, एकदम बढ़िया सीट मज़ा आ गया।











बनिहाल रेलवे स्टेशन












पूरे स्टेशन का दृश्य











यही वह ट्रेन है जो हमे श्रीनगर लेके जायेगी


अब आपको थोडा कश्मीर रेलवे के बारे में बताते है। कश्मीर रेलवे भारत में निर्मित की गई रेलवे लाइन है, जो देश के बाकी के हिस्से को जम्मू कश्मीर राज्य के साथ मिलाती है। यह लाइन जम्मू से शरू होकर 345 किलोमीटर दूर कश्मीर घाटी के पश्चिमोत्तर किनारे बारामूला शहर में पूरी होती है। पर अभी जम्मू से बनिहाल के बीच काम चल रहा है। जो काफी हद तक पूरा हो चूका है। लेकिन अभी ट्रेन बनिहाल से बारामूला के लिए प्रचलन में है। अनुमान से लगभघ 2 साल बाद सीधे जम्मू से चलने लगेगी।


इस परियोजना की लगत 60 अरब रूपए है हम थोडा ही आगे बढे थे की पीर पंजाल रेल सुरंग आ गई इसे (बनिहाल काजीगुंड) रेल सुरंग भी कहते है। यह सुरंग भारत की सबसे लंबी सुरंग है। इस सुरंग का निर्माण समुद्र सतह से 5770 फ़ीट (1760 मी.) की औसत ऊंचाई पर और वर्तमान सड़क मार्ग की सुरंग से 1440 फ़ीट तथा 440 मी. नीचे हुआ है। इस रेल की कड़ी के तैयार हो जाने से यातायात में काफी सुविधा हो गई है, विशेषकर सर्दी के मौसम में जब भीषण ठण्ड और हिमपात के कारण जम्मू श्रीनगर राजमार्ग की सुरंग कई बार बंद करनी पड जाती है पर यह रेल मार्ग खुला रहता है।











पीरपंजाल (बनिहाल काजीगुंड) सुरंग


सुरंग में इतना मज़ा आया के पता ही नहीं लगा कब चार स्टेशन निकल गए और अनंतनाग आ गया। वास्तव में अनंतनाग आया नही था ट्रेन अनंतनाग पहुंची थी। हरियाली दृश्य खेती पहाड़ के बीच से निकल कर ट्रेन आगे बढ़ रही थी। काकापुर पार करते ही झेलम पुल पर पहुँच गई। नीचे झेलम नदी बह रही ही। उसके बाद तो पता ही नहीं लगा हम कब श्रीनगर पहुँच गए करीब  7 बज रहे थे











श्रीनगर रेलवे स्टेशन पर मैं











श्रीनगर रेलवे स्टेशन पर कपिल और अंकित


अंकल ने हमे लेने अपने ड्राईवर को स्टेशन भेजा था हम उनके साथ अंकल में घर चले गए काफी थके हुए थे खाना खा के सो गए।

अभी और आगे आसमान की आघोष  में जाना है।