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पतंग बाज़ी के लिये पहली बार घर से अकेला चल पड़ा दिल्ली से हरिद्वार

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आज से लगभघ 9 साल पहले जब मैं 8वीं कक्षा में था, तब पतंबाज़ी का बहुत शौक था। पतंग की उड़ान के साथ मेरे दिल के अरमान भी लंबी उड़ान भरने के लिये तैयार हो रहे थे। छोटी सी उम्र में ही बहुत बड़े बड़े पेच्चे बाज़ मेरे आगे टिक नहीं पाते थे। मेरी पतंग के मांझे की धार और तलवार की धार मानों एक हो, शायद इसीलिए मेरी पतंग के आगे किसी की पतंग टिक नहीं पाती थी। पहले सुना था बड़े-बड़े पेच्चे बाज़ दूर दूर पतंग के पेंच लड़ाने जाते है। तो मैंने भी सोचा इस बार मैं भी जाऊंगा बसंत पंचमी पर हरिद्वार। पश्चमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बसंत पंचमी को बहुत ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। लोग वसंत ऋतु का स्वागत सरस्वती पूजा के साथ पतंग उडा कर भी करते है।
वैसे तो हरिद्वार में मेरा ननिहाल भी है तो कोई दिक्कत वाली बात नहीं थी।लेकिन अभी घर में से किसी का भी हरिद्वार जाने का कार्यक्रम नहीं है, फिर भी मैंने अपनी मम्मी से हरिद्वार अकेले जाने के लिये पूछा तो उन्होंने ये कह कर मना कर दिया के अभी तू छोटा है।
माँ का दिल तो अपने बच्चे की खुशी के लिए तो सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। मेरे फिर दोबारा आग्रह करने पर मम्मी ने कहा चल …

स्वर्ग सरीखा श्रीनगर शहर

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इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें।
1 जुलाई 2015 सुबह 6 बज रहे है। ठण्ड बहुत हो रही है, रात में नींद काफी अच्छी आई सोते समय रिज़ाई की जरुरत पड़ी लेकिन हमारी सारी थकान दूर हो चुकी है। अभी सो कर उठे ही थे के आंटी चाय लेकर आयी, चाय टेबल पर रखते हुई बोली यहाँ 5 किलोमीटर की दुरी में ही आसपास कई सारी जगह है घूमने की, मैंने अपने भाई को बोल दिया है वह आपको 9 बजे यह सब जगह घुमाने लेकर चला जायेगा मैंने उत्सुकता से पूछा आंटी कहाँ-कहाँ लेकर जायेंगे..?? वह बोली यहाँ पास में ही डल गेट, लाल चौक, लाल चौक पर हनुमान मंदिर, कश्मीर विश्वविद्यालय, मुग़ल गार्डन, जम्मू-कश्मीर विधानसभा आदि कई जगह है, वह लेकर चला जायेगा
अगर अंकल नहीं होते तो हमे यह सब घूमने में कितनी समस्या होती न जाने कितने पैसे खर्च हो जाते पर पैसे खर्च करने के बाद भी उतना अच्छे से यह सब घूम नहीं पाते कश्मीर घूमने का आंनद कई ज्यादा गुना बढ़ जाता है अगर रुकने खाने की व्यवस्था हो जाये तो पर यहाँ तो रुकने, खाने के साथ कश्मीर घूमाने की व्यवस्था  हो गई। बातों बातों में पता ही नहीं चला कब 8 बज गये, हम जल्दी से 1 घण्टे तैयार…

दिल्ली से श्रीनगर (कश्मीर)

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शाम के 5 बज रहे थे 20 जून 2015 का दिन था कश्मीर जाने का मन था सोचा किसी दोस्त को भी साथ ले चलूं। तभी अंकित को फ़ोन किया और कहा कश्मीर चलेगा क्या..?? बोला यार मेरा भी कई दिन से मन कर रहा है चलते है और दो दोस्तों को भी लेजा सकते है क्या..?? मैंने कहा ठीक है कल मिलते है और फ़ोन काट दिया।
जब अंकित को कल मिला और उसको बताया आजकल अमरनाथ यात्रा चल रही है, 28 जून को मेरा एक दोस्त ट्रक लेकर जायेगा उसी में चलेंगे। अंकित के मन में प्रश्नो का पहाड़ खड़ा हो गया, बोला तू पागल हो गया क्या, बहुत थक जायेंगे, यार सोना भी नहीं हो पायेगा।
मैंने बस उसे इतना कहा मज़ा आएगा ट्रक में, एक नया अनुभव मिलेगा। वो जाने के लिये तैयार हो गया और उसने अपने दोस्त प्रमोद को फ़ोन किया वह भी जाने के लिये तैयार हो गया, मैंने भी अपने दोस्त कपिल को फोन किया वह भी तैयार हो गया उसने मुझे पहले से ही कह रखा था अगर कही जाने का प्रोग्राम बने तो मुझे जरूर ले चले। हमने आपस में बात करी 28 जून को सभी गौकुलपुरी चौक मिलेंगे।
यह दिन बड़ी कठिनाई से बीत रहे थे, बार बार मन यही सोच रहा था के कितना रोमांचकारी सफ़र होगा, आखिर मुझे ऐसे सफ़र करने में आंनद…