Sunday, 17 July 2016

अमरनाथ यात्रा का आधार तथा पहला पड़ाव: पहलगाम

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4 जुलाई 2015 की सुबह लगभग 12 बजे हम अंकल के घर से खाना खा पी के निकले ऑन्टी ने अपने भाई को पहले ही कह दिया था के के कल हमे पहलगाम छोड़ने जाना है। तो वह समय से गाड़ी लेकर आ गए थे। अभी थोड़ी आगे ही पहुचे थे के आसमान इतना सुन्दर लगने लगा था कि मेरे पास शब्द नहीं है लिखने को। नीला आसमान हमे ऐसा महसूस करा रहा था के जैसे हम आकाश गंगा में सैर कर रहे हो। करीब पौने दो घंटे में अनंतनाग पहुँच गए। जैसे ही अनंतनाग शुरू होता है सुरक्षा बलों और सेना का कड़क पहरा भी शुरू हो जाता है। ऐसा लगने लगता है जैसे सेना की छावनी हो। यह सब नज़ारे आँखे रूपी कैमरे में कैद करते हुए गाडी लिद्दर नदी के साथ साथ चल रही थी। यह लिद्दर नदी पहलगाम में चार चाँद लगा रही थी दूध जैसी इसकी निर्मल धारा मानो स्वर्ग से उतरकर धरती पर आ रही हो।










20150704_142745पहलगाम में मैं और भारत माता का एक वीर जवान











20150704_142651लिद्दर नदी के किनारे मैं


पहलगाम में बाबा बर्फानी की यात्रा का आधार शिविर है इसलिये यहाँ यात्रियों की सुरक्षा जांच और सामान चेक किया जाता है। पहलगाम में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के द्वारा परिसर में तम्बू लगा रखे थे। यात्री यहां एक रात तो रुकते ही हैं। जैसे टोल गेट होता है वैसा ही यहाँ बना हुआ था इससे आगे गाडी नहीं जा रही थी हमने अंकल के साले से विदाई ली और चल पड़े अपना सामान लेकर। पूरा बेग अच्छे से खोलकर देखा गया। इसी तंबू नगरी में बाजार भी लगा होता है, यहाँ हर वह वस्तु मिलती है जो यात्रा में जरुरी होती है इसी के साथ अनेकों भंडारे जिसमे अनेकों प्रकार की खाने पीने के पकवान आदि यात्रियों की सेवा के लिए लगाए जाते है। बाबा के भक्त करोड़ों रुपये इन भडारों पर यात्रियों के खाने पीने तथा उनकी सेवा के लिए खर्च करते है।











20150704_213028अम्बाला का भंडार उसके आगे मैं अंकित और प्रमोद



पहलगाम के बारे में एक कथा प्रचलित है कि जब शिवजी माता पार्वती को अमर कथा सुनाने अमरनाथ की पवित्र गुफा में ले जा रहे थे तो शिवजी ने यहां पर अपना बैल नन्दी छोडा था। शिवजी नहीं चाहते थे कि पार्वती के अलावा कोई ओर इस कथा को सुने, नहीं तो सुनने वाला भी अमर हो जायेगा। और सृष्टि का विधान गडबडा जायेगा। कहते हैं कि इस स्थान का नाम पहले बैलगांव था जो बाद में पहलगाम हो गया।

अब शाम हो चुकी थी और हमे भूख भी काफी तेज़ लगने लगी थी अंकित को दस्ताने भी खरीदने थे उसके लिये हमने पहले तंबू लिया जो सिर्फ 70 रु में हमे मिल गया। उसमे सामान रखने के बाद हम चल पड़े बाजार में थोड़ा महंगा सामान मिल रहा था लेकिन थोड़ा मोल भाव करने पर ठीक दाम में हमे दस्ताने मिल गए। उसके बाद भंडारे में खा पी कर वापिस आये तो 9 बज चुके थे फिर हम सो गए सुबह जल्दी उठना है 5 बजे यात्रा पहलगाम से शुरू होगी तो जल्दी सोना ठीक समझा पर इतने शौर में नींद कहा आने वाली थी लेकिन हम सो गए।



11 comments:

  1. बहुत अच्छा ऐसा लगा जैसे मैं खुद यात्रा कर रहा हूँ।

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  2. मेरा सौभाग्य है जी आपको मेरा लिखा अनुभव इतना पसंद आया।

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  3. जय बाबा बर्फानी 👍👍👍👌👌👌

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  4. जय बाबा बर्फानी

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  5. अच्छा लगा वृतांत पढ़ कर .. लेखन जारी रखें- शुभकामना

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  6. बहुत बहुत धन्यवाद जी

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  7. अच्‍छा लेखन, अच्‍छा प्रयास ............. बधाई। लेखन जारी रखे।

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  8. धन्यवाद बहन स्वाति जी

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  9. सुन्दर, अति सुंदर लेखन, जान पड़ता है सारा दृश्य आँखों के सामने चल रहा है।

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  10. सुन्दर, अति सुंदर लेखन, जान पड़ता है सारा दृश्य आँखों के सामने चल रहा है।

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  11. धन्यावद राजन जी

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