Monday, 29 August 2016

सम (सैंड ड्यून्स) रेगिस्तान जैसलमेर

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सुबह से हम बेफ़िक्रों की तरह घूम रहे हैं, बहुत ज्यादा थकावट भी होने लगी है आराम करने का मन करने लगा है लेकिन हमारे पास समय भी बहुत कम है। तो इसलिए आराम करना वाजिफ नही। हम कुलधरा से सम (सैंड ड्यून्स) के लिये निकल पड़े।


थोड़ी देर बाद हम सैंड ड्यून्स पहुंचे। वहां पहुंचते ही मेरी तो सारी थकावट दूर हो गई। वहां हर शाम रिसॉर्ट्स में राजस्थानी लोक नृत्य का दिल को छू लेने वाला आयोजन होता है। लेकिन मैंने राजेश को आराम करने नहीं दिया।


अभी तेज धूप हो रही है गर्मी भी काफी लग रही है, ऊंट की सफारी करते है। वो बोला अभी धूप तेज है थोड़ी देर बाद करेंगे। लेकिन मैं नहीं माना और ले गया उसको धूप में ही ऊंट की सफारी करने।


ऊंट वाले ने हम दोनों से 100 रू लिए और काफी दूर तक ऊंट की सफारी कराई। हमने धूप में ही ऊपर कुछ फोटो खींची। और थोड़ी देर बाद आराम करने लगे। अब शाम हो गई है। और यहाँ से सूर्य अस्त होता हुआ बहुत ही आकर्षक लगता है। हज़ारों सैलानी यह सूर्यास्त देखे बिना नहीं जाते। 

दूर दूर तक फैला रेगिस्तान

ऊंट पर मैं

मैं और राजेश धूप में भी मस्ती करते हुए

वाह मज़ा आ गया

रेत पर अपने नाम का पहला अक्षर लिखा मैंने



तो इस सबमे हम कैसे पीछे रह जाते हम भी दुबारा बैठ गए ऊंट पर उसकी सफारी से सूर्यास्त देखने के लिए चलो अब बहुत हो गया अब सवारी कह देते है। दूर दूर तक रेगिस्तान है। ऊंट वाला हमे Sun Set point पर ले गया। वास्तव में नज़ारा देखने लायक है मज़ा आ गया। उसके बाद फिर कुछ फोटो खींचे।

राजेश और मैं ऊंट की सफारी करते हुए

सूर्यास्त का मस्त नजारा



और जब ऊंट की सफारी ओह सवारी करके वापिस आये तो रिसोर्ट में कलाकारों द्वारा आरती उतार कर टीका लगा कर हमारा स्वागत किया गया। जैसे अपने घर में शादी वाले दिन आते है तो माँ आरती उतार कर स्वागत करती है। इस सब के बाद हम अंदर गये। देखा तो राजस्थानी लोक नृत्य का मंच सज चूका था। थोड़ी देर में कार्यक्रम शुरू होने वाला है। जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ राजस्थानी गीतों पे पायल छमछमाने लगी। अलग अलग कलाकारी हो रही है। अरे यह क्या हाथ में आग उठा ली और हाथ जला भी नहीं। यह देखकर तो मैं कायल हो गया। लगभग डेढ़ घंटे बहुत ही रोमांचकारी कार्यकम चला। उसके बाद राजस्थानी खाना वही हुआ मज़ा आ गया।

बढ़िया व्यवस्था

इतना आकर्षित किया कि पर्यटक खुद भी कलाकारों के साथ झूम उठे



हमे थोड़ी जल्दी भी थी लगभग 9 बज गए थे। हम वहां से जल्दी से निकले और पहुँच गए जैसलमेर संघ कार्यालय। वहां थोड़ी देर आराम किया और वहाँ के कार्यकर्ता नरेश जी दिनेश जी आदि हम छोड़ने स्टेशन तक पैदल शॉर्टकट रस्ते से लेकर गए हम लगभग 15 मिनट में स्टेशन पहुंचे। ट्रैन प्लेटफॉम पर लगी हुई थी। उसमे बैठे और पता ही नहीं लगा कब ट्रैन चल दी और हम रात भर सोये और अगले दिन शाम तक दिल्ली आ गए। 

यह यात्रा हमारी बहुत ही मज़ेदार रोचकता से भरपूर नए अनुभवों के साथ पूरी हुई।

Thursday, 25 August 2016

एक वीरान गांव कुलधरा

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लौद्रवा जैन मंदिर से बाहर आकर जैसे ही हम गाड़ी में बैठे तो राजेश ने ड्राइवर साहब से कहा कि भाई साहब अब कहां लेकर जा रहे हो.??

ड्राइवर साहब बोले:- अब हम कुलधरा गांव जा रहे हैं।
राजेश बोला:- क्या है कुलधरा गांव में.??
ड्राइवर साहब:- कुलधरा कोई बहुत बड़े नामी राजा या महाराजा का महल नहीं है, यह तो एक बंजर पड़ा हुआ गांव है। जिसमें कई सौ साल पहले पालीवाल ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने इस गांव को श्राप दे कर एक दिन में यह गांव खाली कर दिया।
राजेश:- तो ड्राइवर साहब यह बताओ उन्होंने अपने इस गांव को एक ही रात में खाली क्यों किया और श्राप भी क्यों दिया।
ड्राइवर साहब:- अरे.!! सारी बात यहीं जान लोगे तो वहां जाकर देखने में मजा नहीं आएगा। बस आप लोग इतना ध्यान रखना कि वहां कोई कंकर पत्थर मत उठाना और ना ही वहां पर किसी भी जगह पिशाब करना।
वाह.!! मैं तो चकित रह गया ड्राइवर साहब ने कुलधरा गांव को लेकर हमारी एक्साइटमेंट बढ़ा दी और मन में एक प्रकार का डर भी उत्पन्न कर दिया। लेकिन मन ऐसा कर रहा था जो जो ड्राइवर साहब ने काम करने के लिए मना किया है वह हम जरूर करेंगे।
एक पतली सी सड़क है दोनों ओर रेत के टीले हैं। रेत बहुत तेजी में उड़ रहा है, लेकिन हमारी गाड़ी के शीशे बंद है और ऐसी ऐसी भी चल रहा है तो रेत के दृश्य और हमारे बीच में शीशा है जो रेत को हमारी आंखों में जाने से बचा रहा है जिस कारण से हमारी घुमक्कड़ का आनंद बढ़ जाता है।
थोड़ी देर बाद हम कुलधरा गांव पहुंचते हैं। ड्राइवर साहब के कहे मुताबिक यह वास्तव में एक उजड़ा हुआ गांव है जैसे हम अंदर गए और हमने देखा जहां घर तो बने हुए हैं लेकिन द्वार टूटा हुआ है, जहां छत तो हैं लेकिन रहता कोई नहीं है। आखिर क्या हुआ होगा यहां.?? क्यों यहाँ गांव वालों ने एक दिन में सारा गांव खाली कर दिया।

कुलधरा का प्रवेश द्वार

वीरान पड़ा कुलधरा गांव

सिर्फ खाली खंडहर

अरे यह क्या.!! यहां तो हमारे और कुछ दो चार पर्यटक के सिवा कोई नहीं दिख रहा लेकिन यहाँ महिलाओं के हंसने की आवाज कहां से आ रही है.?? ऐसा लग रहा है जैसे कोई आवाज लगा रहा है खैर हो सकता है हमारे मन का भ्रम हो।
वास्तव में यह जगह देखने लायक है इतना बड़ा बसा हुआ गांव एक दिन में वीरान हो गया।
आओ आपको यहां के बारे में कुछ बात बताते हैं।
वैसे तो राजस्थान का हर गांव, कस्बा और शहर अपनी आन-बान और शान के लिए भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। मरुप्रदेश के रूप में ख्यात राजस्थान वास्तव में बहुत सी आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक प्रसंगों का धनी है। एक ओर हल्दी घाटी जहां महाराणा प्रताप और अकबर का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ, तो वहीं जयपुर का जंतर मंतर जैसी वेधशाला है।
ऐसा लगता है, जैसे यहां का हर शहर अपने आप में कई कहानियों को अपने में समेटे हुए है। लेकिन इस गांव की एक अलग ही कहानी है, एक अलग ही दास्तां है। जैसलमेर से 18 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव अब एक बड़ा पर्यटक केंद्र बन चुका है और हर रोज सैकड़ों सैलानी यहां आते हैं। आज से लगभग 170 साल पहले कुलधरा गांव में बसे सैकड़ों लोग अपना घरबार छोड़कर रातों-रात ऐसे गायब हुए कि उनका नामो-निशान नहीं मिला।
यह गांव रातों रात क्यों खाली हुआ, किस समाज के लोग यहां रहते थे, आखिर इस गांव के लोग कहां चले गए। आज तक यह गांव दुबारा क्यों नही बस सका? ऐसे सैकड़ों सवाल हमारी तरह आपके मन में भी कौंध रहे होंगे। कुलधरा नाम का यह छोटा सा गांव। कहते हैं सन 1291 के आसपास रईस और मेहनती पालीवाल ब्राह्मणों ने 600 घरों वाले इस गांव को बसाया था। यह भी माना जाता है कि कुलधरा के आसपास 84 गांव थे और इन सभी में पालीवाल ब्राह्मण ही रहा करते थे।
ये ब्राह्मण ना सिर्फ मेहनती बल्कि वैज्ञानिक तौर पर भी सशक्त थे क्योंकि कुलधरा के अवशेषों से यह स्पष्ट अंकित होता है कि कुलधरा के मकानों को वैज्ञानिक आधार से बनाया गया था। पालीवाल ब्राह्मणों का समुदाय सामान्यत: खेती और मवेशी पालन पर निर्भर रहता था। जिप्संम की परत बारिश के पानी को भूमि में अवशोषित होने से रोकती और इसी पानी से पालीवाल ब्राह्मण अपने खेतों को सींचते थे। आज के दौर में शायद किसी को किसी की परवाह नहीं, लेकिन जिस समय की बात हम यहां कर रहे हैं वो समय सिर्फ अपने नहीं बल्कि एक-दूसरे के बारे में सोचने का था। खुशहाल जीवन जीने वाले पालीवाल ब्राह्मणों पर वहां के दीवान सालम सिंह की बुरी नजर पड़ गई। सालम सिंह को एक ब्राह्मण लड़की पसंद आ गई और वह हर संभव कोशिश कर उसे पाने की कोशिश करने लगा। जब उसकी सारी कोशिशें नाकाम होने लगीं तब सालम सिंह ने गांव वालों को यह धमकी दी कि या तो पूर्णमासी तक वे उस लड़की को उसे सौंप दें या फिर वह स्वयं उसे उठाकर ले जाएगा। गांव वालों के सामने एक लड़की के सम्मान को बचाने की चुनौती थी। वह चाहते तो एक लड़की की आहुति देकर अपना घर बचाकर रख सकते थे लेकिन उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। एक रात 84 गांव के सभी ब्राह्मणों ने बैठकर एक निर्णय लिया कि वे रातों रात इस गांव को खाली कर देंगे लेकिन उस लड़की को कुछ नहीं होने देंगे। बस एक ही रात में कुलधरा समेत आसपास के सभी गांव खाली हो गए। जाते-जाते वे लोग इस गांव को श्राप दे गए कि इस स्थान पर कोई भी नहीं बस पाएगा, जो भी यहां आएगा वह बरबाद हो जाएगा। कुलधरा की सुनसान और बंजर जमीन का पीछा वह श्राप आज तक कर रहा है। तभी तो जिसने भी उन मकानों में रहने या उस स्थान पर बसने की हिम्मत की वह बर्बाद हो गया।

मकान बढ़िया बने है लेकिन रहता कोई नहीं है

एक कमरा ऐसा भी

छत की ओर ले जाती सीढ़ी 

चारों तरफ वीराना

एक मंदिर भी है

शी.. भूत आ जायेगा


कई लोगों ने यहाँ की इन बातों को मिथ्या समझा और यहाँ रात गुजारने की कोशिश करी। लेकिन वह वापिस लौट नही पाये और न ही यहाँ पता लगा की वह कहाँ चले गए। खैर हम भी यहाँ से लगभग दोपहर 3:45 पर निकल लिए सम (सैन ड्यून्स) के लिए। वहां अभी सन सेट होते हुए भी देखना है।









Sunday, 21 August 2016

लौद्रवा जैन मंदिर एक अलौकिक विरासत

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आज रात हमे 25013 कॉर्बेट पार्क लिंक एक्सप्रेस से दिल्ली जाना है। यह ट्रेन रात लगभग 12:45 बजे जैसलमेर से निकलती है। हम अभी जैसलमेर दुर्ग से निकले ही थे कि राजेश बोला हितेश भाई मेरा तो यहां एक दिन और रुकने का मन कर रहा है, मुझे दिल्ली में जरुरी काम था तो दोनों की सहमति नहीं बनी इसी वजह से हम तनोट माता के मंदिर के दर्शन नहीं कर पाएंगे, खैर कोई बात नहीं जैसलमेर घुमक्कड़ों के लिए दूर थोडी है एक बार फिर जैसलमेर आ जाएंगे। गाड़ी चल रही है, आगे बढ़ रही है दोनों तरफ रेत के टीले है, ऐसा लग रहा है मानो सोने के पहाड़ बने हुए हैं आंखों के सामने ऐसा दृश्य मन को मोह लेने वाला है। और मेरे शब्द उस अनुभूति की व्याख्या करने में असमर्थ हो रहे हैं बस इस दृश्य को दिल से ही महसूस किया जा सकता है थोड़ी देर बाद हम लौद्रवा जैन मंदिर पहुंचे। ऐसा माना जाता है कि लौद्रवा जैन मंदिर की स्थापना परमार राजपूतों ने कराई थी। बाद में यह मंदिर भाटियों की कब्जे में आ गया।

लौद्रवा का जैन मंदिर कला की दृष्टि से बड़ा महत्व का है। दूर से ऊँचा भव्य शिखर तथा इसमें स्थित कल्पवृक्ष दिखाई पड़्ने लगते हैं। इस मंदिर में गर्भगृह, सभा मंडप मुख मंडप आदि है। यह मंदिर काफी प्राचीन है तथा समय-समय पर इसका जीर्णोधार होता रहा है। मंदिर में प्रवेश करते ही चौक में एक भव्य पच्चीस फीट ऊँचा कलात्मक तोरण स्थित है। इस पर सुंदर आकृतियों का रुपांतन पर खुदाई का काम किया गया है। मंदिर के गर्भगृह में सहसफण पार्श्वनाथ की श्याम मूर्ति प्रतिष्ठित है। यह मूर्ति कसौटी पत्थर की बनी हुई है। गर्भगृह के मुख्य द्वार के निचले हिस्से में गणेश तथा कुबेर की आकृतियाँ बनी हुई हैं। इसके खंभे विशाल हैं, जिसपर घट पल्लव की आकृतियाँ बनी हुई हैं। इस मूर्ति के ऊपर जड़ा हुआ हीरा मूर्ति के अनेक रुपों का दर्शन करवाता है।

इस मंदिर के चारों कोनों में एक-एक मंदिर बना हुआ है। मंदिर के दक्षिण-पूर्वी कोने पर आदिनाथ, दक्षिण-पश्चिमी कोने पर अजीतनाथ, उत्तर-पश्चिमी कोने पर संभवनाथ तथा उत्तर-पूर्व में चिन्तामणी पार्श्वनाथ का मंदिर है। मूल मंदिर के पास कल्पवृक्ष सुशोभित है। मूल प्रासाद पर बना हुआ शिखर बड़ा आकर्षक है। तोरण द्वार, रंगमंडप, मूलमंदिर व अन्य चार मंदिर तथा उन पर निर्मित शिखर और कल्पवृक्ष सभी की एक इकाई के रुप में देखने पर इन सब की संरचना बड़ी भव्य प्रतीत होती है। इस मंदिर में एक प्राचीन कलात्मक रथ रखा हुआ है, जिसमें चिन्तामणि पाश्वनाथ स्वामी की मूर्ति गुजरात से यहाँ लाई गई थी।

लौद्रवा जो आज ध्वस्त स्थिति में है। प्राचीन काल में बड़ा समृद्ध था। यहाँ काल नदी के किनारे प्राचीन शिव मंदिर था। आज लगभग इसका तीन चौथाई भाग भूमिगत हो चुका है। यहाँ पंचमुखी शिवलिंग है। जिसकी तुलना ऐलिफेंटा गुहा व मध्य प्रदेश में मंदसौर से प्राप्त शिवलिंग से की जा सकती है। इसके अतिरिक्त विष्णु, लक्ष्मी, गणपति, शक्ति व कई पशु-पक्षियों की मूर्तियाँ भी रेत में डूबी पड़ी है। प्राचीन कला की दृष्टि से लौद्रवा का आज भी अत्यधिक महत्व है।


चित्र देखिये



लौद्रवा जैन मंदिर

मंदिर में मैं

वाह पोज तो मस्त है

इसके बाद हम यहाँ से जल्दी से निकले और एक वीर गाँव कुलधरा की ओर निकल पड़े मिलते है अगले भाग में कुलधरा गाँव में

अगले भाग में जारी...


जैसलमेर की शान "जैसलमेर दुर्ग"

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'चरथ भिक्‍खवे!'' जिसका अर्थ है - भिक्षुओ! घुमक्कड़ी करो। यह सच ही लगती है। वास्तव में घुमक्कड़ी से मन भी बहुत शांत और प्रसन्न रहता है। जैसलमेर की गलियां ऐसी लग रही है मानो हम सोने की खदानों में चल रहे हों। धीरे धीरे धुप का ताप भी बढ़ रहा है लेकिन इस बात से घुमक्कड़ों को कोई फर्क नहीं पड़ता। दिन के लगभग 1 बज है। हम जैसलमेर दुर्ग पहुँचते है। दुर्ग में प्रवेश से पहले कलाकृत्यों से सुसज्जित गलियों से होकर गुज़ारना पड़ता है वहां हाथ के द्वारा बनाई गई कलाकृतियों की दुकानें हैं जो दुर्ग की शोभा बढ़ा रही है। एक ख़ास बात इन गलियों में लोगो के घर भी बने हुए है।

जैसलमेर दुर्ग स्थापत्य कला की दृष्टि से उत्तमकोटि का स्थानीय दुर्ग  है। इस दुर्ग का निर्माण 1156 में शुरू हुआ यह दुर्ग 250 फीट तिकोनाकार पहाडी पर स्थित है। इस पहाडी की लंबाई 250 फीट व चौङाई 750 फीट है। जैसलमेर दुर्ग पीले पत्थरों के विशाल खण्डों से बना हुआ है। पूरे दुर्ग में कहीं भी चूना या गारे का इस्तेमाल नहीं किया गया है। मात्र पत्थर पर पत्थर जमाकर फंसाकर या खांचा देकर रखा हुआ है। दुर्ग की पहाडी की तलहटी में चारों ओर 25 से 20 फीट ऊँचा घाघरानुमा परकोट खिचा हुआ है, इसके बाद 200 फीट की ऊँचाई पर एक परकोट है, जो 10 से 156 फीट ऊँचा है। इस परकोट में गोल बुर्ज व तोप व बंदूक चलाने हेतु कंगूरों के बीच बेलनाकार विशाल पत्थर रखा है।वैसे तो दुर्ग में कई महल (विलास) है लेकिन एक "सर्वोत्तम" विलास जो एक अत्यंत सुंदर व भव्य इमारत है, जिसमें मध्य एशिया की नीली चीनी मिट्टी की टाइलों व यूरोपीय आयातित कांचों का बहुत सुंदर जड़ाऊ काम किया गया है। इसे वर्तमान में "शीशमहल" और "अखैविलास" के नाम से भी जाना जाता है। यह दुर्ग ऐसी जगह के हर किसी का मन मोह लेगी और उसका लगाव जैसलमेर से हमेसा हो जायेगा वो बार बार जैसलमेर जाने का कार्यक्रम बनायेगा।



दुर्ग के बाहर गली में चरखा



दुर्ग के बाहर मैं

गली में एक घर विवाह का निमंत्रण देने की अदभुत शैली



कभी आप भी जैसलमेर में घुमक्कड़ी करके आइये बहुत मज़ा आएगा लेकिन इतना सारा सोना देखकर मन में लालच को मत आने देना इसके बाद हम लौद्रवा जैन मंदिर गए।
अगले भाग में जारी...

Friday, 12 August 2016

जैसलमेर की सबसे पुरानी पटवा हवेली की सैर

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भारत के गौरवशाली इतिहास को जानने के लिए राजस्थान बहुत बढ़िया जगह है। खैर गढ़ीसर तालाब से हम बाहर आते ही गाड़ी में बैठ गए। और कुछ ही देर में ड्राइवर साहब हमे पटवों की हवेली ले गए। बहुत शानदार हवेली। जो देखते ही मन मोह ले। यह हवेली पटवा परिसर के पास स्थित है और जैसलमेर की पहली हवेली है। इस पीले बलुआ पत्थर की इमारत के निर्माण में 50 साल लग गए। वर्तमान में, यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का कार्यालय और राज्य कला और शिल्प विभाग स्थित हैं। 
छियासठ झरोखों से युक्त ये हवेलियाँ निसंदेह कला का सर्वेतम उदाहरण है। ये कुल मिलाकर पाँच हैं, जो कि एक-दूसरे से सटी हुई हैं। ये हवेलियाँ भूमि से 8-10 फीट ऊँचे चबूतरे पर बनी हुई है व जमीन से ऊपर छः मंजिल है व भूमि के अंदर एक मंजिल होने से कुल 7 मंजिली हैं। पाँचों हवेलियों के अग्रभाग बारीक नक्काशी व अनेक प्रकार की कलाकृतियाँ युक्त खिङ्कियों, छज्जों व रेलिंग से अलंकृत है। जिसके कारण ये हवेलियाँ अत्यंत भव्य व कलात्मक दृष्टि से अत्यंत सुंदर व सुरम्य लगती है। हवेलियों में अंदर जाने के लिए सीढियाँ चढ़कर चबूतरे तक पहुँचकर दीवान खाने (मेहराबदार बरामदा) में प्रवेश करना पडता है। दीवान खाने से लकडी की चौखट युक्त दरवाजे से अंदर प्रवेश करने पर पहले कमरे को मौ प्रथम कहा जाता है। इसके बाद चौकोर चौक है, जिसके चारों ओर बरामदा व छोटे-छोटे कमरे बने हुए हैं। ये कमरे 6'x 6' से 8' के आकार के हैं, ये कमरे प्रथम तल की भांति ही 6 मंजिल तक बने हैं। सभी कमरें पत्थरों की सुंदर खानों वाली अलमारियों व आलों ये युक्त हैं, जिसमें विशिष्ट प्रकार के चूल युक्त लकडी के दरवाजे व ताला लगाने के लिए लोहे के कुंदे लगे हैं। पहली मंजिल के कमरे रसोइ, भण्डारण, पानी भरने आदि के कार्य में लाए जातेजबकि अन्य मंजिलें आवासीय होती थ। दीवान खानें के ऊपर मुख्य मार्ग की ओर का कमरा अपेक्षाकृत बङा है, जो सुंदर सोने की कलम की नक्काशी युक्त लकडी की सुंदर छतों से सुसज्जित है। यह कमरा मोल कहलाता है, जो विशिष्ट बैठक के रुप में प्रयुक्त होता है।

प्रवेश द्वारो, कमरों और मेडियों के दरवाजे पर सुंदर खुदाई का काम किया गया है। इन हवेलियों में सोने की कलम की वित्रकारी, हाथी दांत की सजावट आदि देखने को मिलती है। शयन कक्ष रंग बिरंगे विविध वित्रों, बेल-बूटों, पशु-पक्षियों की आकृतियों से युक्त है। हवेलियों में चूने का प्रयोग बहुत कम किया गया है। अधिकांशतः खाँचा बनाकर एक दूसरे को पिघले हुए शीशे से लोहे की पत्तियों द्वारा जोङा गया है। भवन की बाहरी व भीतरी दीवारें भी प्रस्तर खंडों की न होकर पत्थर के बडे-बडे आयताकार लगभग 3-4 इंच मोटे पाटों (स्लैब) को एक दूसरे पर खांचा देकर बनाई गई है, जो उस काल की उच्च कोटि के स्थापत्य कला का प्रदर्शन करती हैं।

पटवों की हवेलियाँ अट्ठारवीं शताब्दी से सेठ पटवों द्वारा बनवाई गई थीं। वे पटवे नहीं, पटवा की उपाधि से अलंकृत रहे। उनका सिंध-बलोचिस्तान, कोचीन एवं पश्चिम एशिया के देशों में व्यापार था और धन कमाकर वे जैसलमेर आए थे। कलाविद् एवं कलाप्रिय होने के कारण उन्होने अपनी मनोभावना को भवनों और मंदिरों के निर्माण में अभिव्यक्त किया। पटुवों की हवेलियाँ भवन निर्माण के क्षेत्र में अनूठा एवं अग्रगामी प्रयास है।
मेरा तो यही विचार है जब भी आप जैसलमेर जाये तो पटवा हवेली जरूर जायें।

चित्र देखिये


पटवा हवेली

बाहर से झरोखे का एक दृश्य

पटवा हवेली के बाहर मैं


पत्थर से जड़ी हुई भगवान की एक मुर्ति


शीशे से बनी मोर की कलाकृति

बाहर से दीखते झरोखे

वाह गज़ब 

शीशे से सुसज्जित मोहिनी विलास


इसके बाद हम जैसलमेर दुर्ग गए। उसका वृत्तान्त पढ़ने के लिए आपको थोड़ा इन्तजार करना होगा।

अगले भाग में जारी..

Thursday, 4 August 2016

जैसलमेर की पहले बदनाम कही जाने वाली जगह "गढ़ीसर तालाब" की सैर

मेहरानगढ़ दुर्ग से 4 बजे वापिस आ गए रात 11:45 की ट्रेन जोधपुर जैसलमेर एक्सप्रेस से हमे जैसलमेर जाना है। इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें


खाना पीना खा कर हम 10:30 बजे ही जोधपुर स्टेशन पहुँच गए। और ट्रेन का इन्तजार करने लगे लगभग 11 बजे ट्रैन प्लेटफार्म पर आयी। हम जर्नल में बैठ गए कुछ ज्यादा भीड़ नहीं थी सीट आसानी से मिल गयी। लेकिन हम सीट पर नहीं बैठे ऊपर की सीट पर जाकर लेट गए। ठीक समय पर ट्रेन चली। और बाहर का नज़ारा तो कुछ दिख नहीं रहा था इसलिये थोड़ी देर बाद ही नींद आ गई। लगभग सुबह 3:45 पर आँख खुली तो पोखरण रेलवे स्टेशन पर ट्रेन खड़ी थी अभी जैसलमेर दूर है तो मैं फिर सो गया। अब आंख खुली सुबह 5:00 बजे ट्रैन लगभग खाली हो चुकी थी। तो हम नीचे आकर सीट पर बैठ गए पास बैठे एक सहयात्री से पता किया श्री भादरिया लाठी स्टेशन निकल गया अगला स्टेशन जैसलमेर है। जैसलमेर राज्य भारत के पश्चिम भाग में स्थित थार के रेगिस्तान के दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में फैला हुआ था। मानचित्र में जैसलमेर राज्य की स्थिति  20001 से 20002 उत्तरी अक्षांश व 69029 से 72020 पूर्व देशांतर है। परंतु इतिहास के घटनाक्रम के अनुसार उसकी सीमाएँ सदैव घटती बढ़ती रहती थी। जिसके अनुसार राज्य का क्षेत्रफल भी कभी कम या ज्यादा होता रहता था। जैसलमेर का क्षेत्र थार के रेगिस्तान में स्थित है। यहाँ दूर-दूर तक स्थाई व अस्थाई रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले हैं, जो कि हवा, आंधियों के साथ-साथ अपना स्थान भी बदलते रहते हैं। इन्हीं रेतीले टीलों के मध्य कहीं-कहीं पर पथरीले पठार व पहाड़ियाँ भी स्थित हैं। इस संपूर्ण इलाके का ढाल सिंध नदी व कच्छ के रण अर्थात् पश्चिम-दक्षिण की ओर है। पश्चिमी राजस्थान में सोने की सी चमक लिए स्वर्ण नगरी जैसलमेर देशी-विदेशी सैलानियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। अपनी सोने जैसी आभा के कारण लोगों को अपनी ओर खींचने वाली इस नगरी में घुमक्कड़ लोगों के घूमने के लिए कई स्थान है। खैर यहाँ जैसलमेर में अपने काफी परिचित लोग रहते है तो मैंने अपने मित्र पवन विश्नोई जी को जोधपुर में ही फोन कर दिया था के कल सुबह हम जैसलमेर आएंगे वो हमें लेने आ जाएं और हमारी आज रात ठहरने की व्यवस्था कर दें। वह विश्व हिंदू परिषद के जैसलमेर जिला मंत्री है उनका यह कहना था कि उन्होंने हमारी सारी व्यवस्था संघ कार्यालय में कर दी। रेलवे स्टेशन ट्रेन से बाहर का नज़ारा बड़ा मनमोहक है दोनों तरफ रेत के टीलों के बीच में से ट्रेन निकलती है और हल्की ठंडी हवा बड़ा ही अच्छा लग रहा है। थोड़ी देर बाद लगभग 6:15 पर जैसलमेर जंक्शन आया। तो पवन जी को फिर फोन किया वो गाडी लेकर स्टेशन स्टेट बैंक में ATM के पास खड़े थे हम चारों उनके पास पहुँच गए। वह हमें संघ कार्यालय ले आये जो उमा मार्ग गांधी कॉलोनी में है वहां पहुंचकर हम नित्य कर्म से निर्वित हुए इसके बाद पवन जी नेहमारे बढ़िया नाश्ते की व्यवस्था की एक दम बढ़िया जैसलमेरी छोले भटूरे खा के मज़ा आ गया।

जैसलमेर की गलियों में मैं

संघ कार्यालय के बाहर मैं

मैं राजेश और जैसलमेर में रहने वाला सैब्बी


  फिर लगभग 9 बजे हमने एक टैक्सी वाला बुलवाया उसने हमें 1200 रु में कई सारी जगह ले जाने का बताया तो पवन जी ने 1000 रु करवा दिए।  टैक्सी वाला हमे आज ले जाने वाला है सबसे पहले गढी सर तालाब फिर पटवा हवेली, सालम सिंह हवेली, लौद्रवा जैन मंदिर फिर कुलधरा गांव और उसके बाद सम "सैनड्यून" वहां कई रिसोर्ट है और उनमें राजस्थानी लोक नृत्य फोक डांस का बेहद सुन्दर आयोजन होता है और उसके बाद राजस्थानी खाना भी होता है। कार्यालय से लगभग हम 10 बजे निकले और सबसे पहले हम पहुंचे गढीसर तालाब। यह वह जगह है जिसके नाम के आगे बदनाम लगा हुआ है।  वैसे वास्तव में यह जगह अपने-आप में खासा ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। जहां राजस्थान के कई ऐतिहासिक स्थान विभिन्न राजघरानों के कारण बेहद प्रसिद्ध हुए हैं, वहीं जैसलमेर की यह झील यहां का एकमात्र ऐसा स्थान है जो एक वेश्या के कारण प्रसिद्ध हुई है। सन् 1909 में निर्मित कराए गए इस प्रवेश द्वार को लोग 'वेश्या के द्वार' के नाम से भी जानते हैं। कहते हैं कि स्वर्ण नगरी जैसलमेर में जिस समय महारावल (राजा) सैलन सिंह की सत्ता थी, उसी समय वहां तेलन नाम की एक वेश्या भी रहा करती थी। पूरे राज्य में उसकी खूबसूरती का कोई सानी नहीं था। तेलन जितनी रूपवती थी, उतनी धन-दौलत से संपन्न थी, लेकिन उसने अपने धन का दुरुपयोग न करके उसे हमेशा धार्मिक कार्यों और समाज की भलाई में लगाया। तेलन जब जैसलमेर का ऐतिहासिक गढ़ीसर तालाब का प्रवेश द्वार बनवा रही थी,  तब पूरे नगर में चर्चा होने लगी कि महारावल के होते हुए एक वेश्या प्रवेश द्वार क्यों बनवाये।

नगरवासी अपनी अर्जी लेकर महारावल के पास पहुंचे और अपना दर्द बयां किया। नगरवासियों से महारावल के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि गढ़ीसर तालाब पर एक वेश्या प्रवेश द्वार बनवा रही है। चूंकि पूरे नगर में जल आपूर्ति का प्रमुख साधन गढ़ीसर तालाब ही है और अब नगरवासी एक बदनाम औरत द्वारा बनवाये गए प्रवेश द्वार से जाकर पानी लेकर आयेंगे, जो सही नहीं है। महारावल ने नगरवासियों की समस्या को सुना और अपने मंत्री और सलाहकारों के साथ इस बात पर विचार-विमर्श करने के बाद आदेश जारी किया कि वेश्या द्वारा बनवाये जा रहे प्रवेश द्वार को तत्काल गिरा दिया जाए।

जब तेलन को इस बात की जानकारी मिली कि नगरवासियों से उसके खिलाफ महारावल से शिकायत की है और राजा ने उसके द्वारा बनवाए जा रहे प्रवेश द्वार को गिराने के आदेश जारी किये हैं, उस समय द्वार निर्माण का कार्य अंतिम चरण में था। अतः उसने प्रवेश द्वार पर भगवान विष्णु का एक मंदिर बनवा दिया। जब महारावल के सेवक द्वार गिराने वहां पहुंचे, तो द्वार के ऊपर भगवान विष्णु का मंदिर पाया। चूंकि भगवान विष्णु हिंदुओं के आराध्य देव हैं और मंदिर को गिराना हिंदुओं की आस्था का अपमान है, अतः सेवकों ने प्रवेश द्वार को हाथ भी नहीं लगाया और तेलन का निर्माण कार्य जैसलमेर के इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया।

गढ़ीसर तालाब के गेट के बाहर राजेश मैं और जैसलमेर में रहने वाला पियूष

गढ़ीसर तालाब

समाज बुरा माने लेकिन किया उसने महान काम उसी का परिणाम है यह गढ़ीसर तालाब 


इस जगह के दर्शन करके मन में कई प्रश्नों के पहाड़ खड़े हो गये। आखिर क्या फरक पड़ता है व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से बुरा है लेकिन सामाजिक दृष्टि से वह काम तो अच्छा कर रहा है। यह उथल पथल मन में चलती रही। खैर हमारा आगे ऊपर लिखी जगह पर क्रमसः जाना हुआ उसका संस्मरण

अगले भाग में जारी...

Monday, 1 August 2016

दिल्ली से जोधपुर

जिनके खून में घुमक्कड़ी होती है उनको न समय की चिंता होती है न ही पैसों की परवाह। चाहे मौसम अनुकूल हो या प्रतिकूल उन्हें इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वो तो बस एक आज़ाद पंछी की तरह नील गगन में ऊंचाइयों के शिखर पर उड़ता ही जाता है। ऐसी ही 9 फरवरी 2015 को मेरे मन में विचार आया इस बार राजस्थान की तरफ जाना चाहिए.!! तभी गौरव को फ़ोन किया मैंने कहा भाई इस बार राजस्थान जाना है बता कहाँ चले वो छूटते ही बोला जोधपुर चलते है फिर वहां से जैसलमेर चलेंगे। मैंने कहा ठीक है और दो दोस्त ओम और राजेश को फोन किया दोनों जाने के लिए तैयार हो गए। अब हम चार लोग है जाने के लिये 12 फरवरी 2015 को मंडोर एक्सप्रेस से जाने का आरक्षण करवा लिया। वैसे तो घुमक्कड़ को कोई फर्क नहीं पड़ता के आरक्षण हो या सामान्य लेकिन बस थोड़ा भीड़-भाड़ से बचना चाहता था और राजेश को जर्नल में जाने का बिलकुल भी अनुभव नहीं है। दो दिन बीत गए 12 फरवरी आयी मंडोर एक्सप्रेस रात में 9:15 पर चलती है तो पहले ही सबको कह दिया था के समय से पहुंच जाना भई आरक्षण था तो इसलिए ढूंढने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई मैं सबसे पहले अपने डिब्बे के पास पहुंचा फिर गौरव आया ओम और राजेश साथ आ रहे थे। चरों मिल गए सीट पर बैठे ट्रैन सही पर चलने लगी अभी दिल्ली केंट पहुंचे थे के पेट में चूहे कूदने लगे सभी अपने अपने घर से खाना बनवा कर लाये थे तो सबने अपना अपना खाना खोल लिया और टूट पड़े। फिर सभी ने अपनी अपनी बर्थ खोल ली और सो गए। मुझे सफर में अक्सर नींद कम आती है लेकिन जब अलवर आया तो मैं भी सो गया करीब 12:30 बज रहे होंगे। फिर कंज खुली ठीक 3 बजे देखा तो ट्रेन रुकी हुई थी बहार देखा जयपुर जंक्शन पर ट्रेन खड़ी थी। जयपुर से चलते ही मैं फिर सो गया। अब सीधे 6 बजे आंख खुली ट्रेन थोड़ी लेट चल रही थी करीब 6:15 बजे मेडता जंक्शन आया। बाहर का नज़ारा बहुत शानदार है। हलके हलके सुरमई बादल, ठंडी हवा, सूरज की पिली किरणें, पीला प्रकाश पर कहीं ताप झलकता नहीं। पुरे राजस्थान में फैली 480 कि॰मी॰ लम्बी अरावली पर्वत श्रृंखला प्राकृतिक दृष्टि से राज्य को दो भागों में विभाजित करती है। वैसे तो राजस्थान में काफी ज्यादा गर्मी रहती है लेकिन हम गए भी ऐसे मौसम में थे जब गर्मी नहीं थी थोड़ी देर बाद लगभग 8:10 पर जोधपुर जंक्शन आया। वर्ष प्रयत्न चमकने वाले सूर्य, मौसम के कारण इसे "सूर्य नगरी भी कहा जाता है। यहाँ स्थित मेहरानगढ़ दुर्ग को घेरे हज़ारों नीले मकानों के कारण इसे "नीली नगरी" नाम से भी जाना जाता है। 
जोधपुर रेलवे स्टेशन के बाहर मैं
बहार निकलते हुए टिकेट चेकर को मोबाइल में टिकट का msg दिखाया और रेलवे स्टेशन के बाहर से ऑटो किया और सीधे नयी सड़क गैलेक्सी होटल पहुँच गए। यह होटल अपने एक मित्र का है तो इसलिए रुकने की व्यवस्था फ्री हो गई थोड़ी देर आराम किया लगभग 11 बजे तक फिर वहीँ अपने एक मित्र वीरेन्द्र जी को बुलवा लिया वह सूरसागर रहते है। उन्ही के साथ बाहर भोजन किया और आज का दिन तो पूरा वहां के कुछ मित्रों से मिलने-जुलने और आराम करने में लगा दिया। आज आखा तीज है और यहाँ जोधपुर में तीज का त्यौहार मुख्य रूप से महिलायों को समर्पित है इस दिन यहाँ इस दिन महिलाएं आधी रात को अपने अपने घरों से बाहर निकलती है झुण्ड बनाकर जैसे मेले में जा रही हो और उनके सामने जो भी भाई (पुरुष) आता है उसके छड़ी मरती है। ऐसी मान्यता है कि जिसके छड़ी लगती है उसकी शादी जल्दी हो जाती है। मेरे भी छड़ी लगी काफी तेज लग गई घाव भी हो गया खून निकलने लगा और दर्द भी काफी तेज होने लगा लेकिन इसके लिए किसी को शिकायत नहीं की जा सकती थी यह यहाँ की परंपरा है। लेकिन यह कार्यक्रम देखकर बहुत अच्छा लगा पहली बार ऐसा त्यौहार देखा एक अलग ही विरासत है राजस्थान की ऐसी विरासत है के सबका मन मोह ले।

तीज माई


मेरे हाथ में लगी छड़ी

ऐसे जगह जगह लगे मेले जहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते है


रात में जगमगाता शहर जोधपुर


मैं और राजेश
 अगलेदिन सुबह मेहरानगढ़ फोर्ट के लिए निकल गए। मेहरानगढ किला राजस्थान प्रांत में जोधपुर शहर में स्थित है। पन्द्रहवी शताब्दी का यह विशालकाय किला, पथरीली चट्टान पहाड़ी पर, मैदान से 125 मीटर ऊँचाई पर स्थित है और आठ द्वारों व अनगिनत बुर्जों से युक्त दस किलोमीटर लंबी ऊँची दीवार से घिरा है। बाहर से अदृश्य, घुमावदार सड़कों से जुड़े इस किले के चार द्वार हैं। यह किला भारत के प्राचीनतम किलों में से एक है और भारत के समृद्धशाली अतीत का प्रतीक है। राव जोधा जोधपुर के राजा रणमल की 24 संतानों मे से एक थे। वे जोधपुर के पंद्रहवें शासक बने। शासन की बागडोर सम्भालने के एक साल बाद राव जोधा को लगने लगा कि मंडोर का किला असुरक्षित है। उन्होने अपने तत्कालीन किले से 1 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर नया किला बनाने का विचार प्रस्तुत किया। इस पहाड़ी को भोर चिडिया के नाम से जाना जाता था, क्योंकि वहाँ काफ़ी पक्षी रहते थे। किले के अंदर कई भव्य महल, अद्भुत नक्काशीदार किवाड़, जालीदार खिड़कियाँ और प्रेरित करने वाले नाम हैं। इनमें से उल्लेखनीय हैं मोती महल, फूल महल, शीश महल, सिलेह खाना, दौलत खाना आदि। इन महलों में भारतीय राजवेशों के साज सामान का विस्मयकारी संग्रह निहित है।राव जोधा को चामुँडा माता मे अथाह श्रद्धा थी। चामुंडा जोधपुर के शासकों की कुलदेवी होती है। राव जोधा ने 1460 मे मेहरानगढ किले के समीप चामुंडा माता का मंदिर बनवाया और मूर्ति की स्थापना की। मंदिर के द्वार आम जनता के लिए भी खोले गए थे। चामुंडा माँ मात्र शासकों की ही नहीं बल्कि अधिसंख्य जोधपुर निवासियों की कुलदेवी थी और आज भी लाखों लोग इस देवी को पूजते हैं। नवरात्रि के दिनों मे यहाँ विशेष पूजा अर्चना की जाती है।
अलग ही महसूस हो रहा था यहाँ की नक्काशी देख कर बिलकुल मज़ेदार नक्काशी ऐसी जो शायद अब कोई नहीं कर पाए। मज़ा आ गया देखकर और गर्व महसूस हुआ भारत में ऐसी ऐसी जगह है जिनका कोई जवाब नहीं।


मेहरानगढ़ दुर्ग बायें से गौरव, मैं और ओम

मैं और ओम

गांव के लोगो के साथ मैं और ऊपर कई तोप रखी है

वाह कलाकृतियों का कोई जवाव नहीं

गज़ब की नक्काशी है 

वाह मज़ा आ गया

कुछ पुराने हथियार रखे है दुर्ग में

एक सुरंग भी है

दिल खुश हो गया देख कर


दुर्ग से नीचे देखो तो सारे नीले नीले घर जिस कारण से जोधपुर को Blue City कहा जाता है

फिर दुर्ग से वापिस गैलेक्सी होटल आने में हमे लगभग 4 बज गए रात को जैसलमेर के लिये निकलेंगे। जोधपुर की अन्य विरासत जैसे उमेद भवन, जसवंत ठाडा, बालसमंद लेक आदि अगली बार घूमेंगे।