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Showing posts from August, 2016

सम (सैंड ड्यून्स) रेगिस्तान जैसलमेर

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सुबह से हम बेफ़िक्रों की तरह घूम रहे हैं, बहुत ज्यादा थकावट भी होने लगी है आराम करने का मन करने लगा है लेकिन हमारे पास समय भी बहुत कम है। तो इसलिए आराम करना वाजिफ नही। हम कुलधरा से सम (सैंड ड्यून्स) के लिये निकल पड़े।

थोड़ी देर बाद हम सैंड ड्यून्स पहुंचे। वहां पहुंचते ही मेरी तो सारी थकावट दूर हो गई। वहां हर शाम रिसॉर्ट्स में राजस्थानी लोक नृत्य का दिल को छू लेने वाला आयोजन होता है। लेकिन मैंने राजेश को आराम करने नहीं दिया।

अभी तेज धूप हो रही है गर्मी भी काफी लग रही है, ऊंट की सफारी करते है। वो बोला अभी धूप तेज है थोड़ी देर बाद करेंगे। लेकिन मैं नहीं माना और ले गया उसको धूप में ही ऊंट की सफारी करने।

ऊंट वाले ने हम दोनों से 100 रू लिए और काफी दूर तक ऊंट की सफारी कराई। हमने धूप में ही ऊपर कुछ फोटो खींची। और थोड़ी देर बाद आराम करने लगे। अब शाम हो गई है। और यहाँ से सूर्य अस्त होता हुआ बहुत ही आकर्षक लगता है। हज़ारों सैलानी यह सूर्यास्त देखे बिना नहीं जाते। 







तो इस सबमे हम कैसे पीछे रह जाते हम भी दुबारा बैठ गए ऊंट पर उसकी सफारी से सूर्…

एक वीरान गांव कुलधरा

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लौद्रवा जैन मंदिर से बाहर आकर जैसे ही हम गाड़ी में बैठे तो राजेश ने ड्राइवर साहब से कहा कि भाई साहब अब कहां लेकर जा रहे हो.??
ड्राइवर साहब बोले:- अब हम कुलधरा गांव जा रहे हैं। राजेश बोला:- क्या है कुलधरा गांव में.?? ड्राइवर साहब:- कुलधरा कोई बहुत बड़े नामी राजा या महाराजा का महल नहीं है, यह तो एक बंजर पड़ा हुआ गांव है। जिसमें कई सौ साल पहले पालीवाल ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने इस गांव को श्राप दे कर एक दिन में यह गांव खाली कर दिया। राजेश:- तो ड्राइवर साहब यह बताओ उन्होंने अपने इस गांव को एक ही रात में खाली क्यों किया और श्राप भी क्यों दिया। ड्राइवर साहब:- अरे.!! सारी बात यहीं जान लोगे तो वहां जाकर देखने में मजा नहीं आएगा। बस आप लोग इतना ध्यान रखना कि वहां कोई कंकर पत्थर मत उठाना और ना ही वहां पर किसी भी जगह पिशाब करना। वाह.!! मैं तो चकित रह गया ड्राइवर साहब ने कुलधरा गांव को लेकर हमारी एक्साइटमेंट बढ़ा दी और मन में एक प्रकार का डर भी उत्पन्न कर दिया। लेकिन मन ऐसा कर रहा था जो जो ड्राइवर साहब ने काम करने के लिए मना किया है वह हम…

लौद्रवा जैन मंदिर एक अलौकिक विरासत

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आज रात हमे 25013 कॉर्बेट पार्क लिंक एक्सप्रेस से दिल्ली जाना है। यह ट्रेन रात लगभग 12:45 बजे जैसलमेर से निकलती है। हम अभी जैसलमेर दुर्ग से निकले ही थे कि राजेश बोला हितेश भाई मेरा तो यहां एक दिन और रुकने का मन कर रहा है, मुझे दिल्ली में जरुरी काम था तो दोनों की सहमति नहीं बनी इसी वजह से हम तनोट माता के मंदिर के दर्शन नहीं कर पाएंगे, खैर कोई बात नहीं जैसलमेर घुमक्कड़ों के लिए दूर थोडी है एक बार फिर जैसलमेर आ जाएंगे। गाड़ी चल रही है, आगे बढ़ रही है दोनों तरफ रेत के टीले है, ऐसा लग रहा है मानो सोने के पहाड़ बने हुए हैं आंखों के सामने ऐसा दृश्य मन को मोह लेने वाला है। और मेरे शब्द उस अनुभूति की व्याख्या करने में असमर्थ हो रहे हैं बस इस दृश्य को दिल से ही महसूस किया जा सकता है थोड़ी देर बाद हम लौद्रवा जैन मंदिर पहुंचे। ऐसा माना जाता है कि लौद्रवा जैन मंदिर की स्थापना परमार राजपूतों ने कराई थी। बाद में यह मंदिर भाटियों की कब्जे में आ गया।

लौद्रवा का जैन मंदिर कला की दृष्टि से बड़ा महत्व का है। दूर से ऊँचा भव्य शिखर तथा इसमें स्थि…

जैसलमेर की शान "जैसलमेर दुर्ग"

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'चरथ भिक्‍खवे!'' जिसका अर्थ है - भिक्षुओ! घुमक्कड़ी करो। यह सच ही लगती है। वास्तव में घुमक्कड़ी से मन भी बहुत शांत और प्रसन्न रहता है। जैसलमेर की गलियां ऐसी लग रही है मानो हम सोने की खदानों में चल रहे हों। धीरे धीरे धुप का ताप भी बढ़ रहा है लेकिन इस बात से घुमक्कड़ों को कोई फर्क नहीं पड़ता। दिन के लगभग 1 बज है। हम जैसलमेर दुर्ग पहुँचते है। दुर्ग में प्रवेश से पहले कलाकृत्यों से सुसज्जित गलियों से होकर गुज़ारना पड़ता है वहां हाथ के द्वारा बनाई गई कलाकृतियों की दुकानें हैं जो दुर्ग की शोभा बढ़ा रही है। एक ख़ास बात इन गलियों में लोगो के घर भी बने हुए है।
जैसलमेर दुर्ग स्थापत्य कला की दृष्टि से उत्तमकोटि का स्थानीय दुर्ग  है। इस दुर्ग का निर्माण 1156 में शुरू हुआ यह दुर्ग 250 फीट तिकोनाकार पहाडी पर स्थित है। इस पहाडी की लंबाई 250 फीट व चौङाई 750 फीट है। जैसलमेर दुर्ग पीले पत्थरों के विशाल खण्डों से बना हुआ है। पूरे दुर्ग में कहीं भी चूना या गारे का इस्तेमाल नहीं किया गया है। मात्र पत्थर पर पत्थर जमाकर फंसाकर या खांचा देकर …

जैसलमेर की सबसे पुरानी पटवा हवेली की सैर

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भारत के गौरवशाली इतिहास को जानने के लिए राजस्थान बहुत बढ़िया जगह है। खैर गढ़ीसर तालाब से हम बाहर आते ही गाड़ी में बैठ गए। और कुछ ही देर में ड्राइवर साहब हमे पटवों की हवेली ले गए। बहुत शानदार हवेली। जो देखते ही मन मोह ले। यह हवेली पटवा परिसर के पास स्थित है और जैसलमेर की पहली हवेली है। इस पीले बलुआ पत्थर की इमारत के निर्माण में 50 साल लग गए। वर्तमान में, यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का कार्यालय और राज्य कला और शिल्प विभाग स्थित हैं।  छियासठ झरोखों से युक्त ये हवेलियाँ निसंदेह कला का सर्वेतम उदाहरण है। ये कुल मिलाकर पाँच हैं, जो कि एक-दूसरे से सटी हुई हैं। ये हवेलियाँ भूमि से 8-10 फीट ऊँचे चबूतरे पर बनी हुई है व जमीन से ऊपर छः मंजिल है व भूमि के अंदर एक मंजिल होने से कुल 7 मंजिली हैं। पाँचों हवेलियों के अग्रभाग बारीक नक्काशी व अनेक प्रकार की कलाकृतियाँ युक्त खिङ्कियों, छज्जों व रेलिंग से अलंकृत है। जिसके कारण ये हवेलियाँ अत्यंत भव्य व कलात्मक दृष्टि से अत्यंत सुंदर व सुरम्य लगती है। हवेलियों में अंदर जाने के लिए सीढियाँ चढ़कर…

जैसलमेर की पहले बदनाम कही जाने वाली जगह "गढ़ीसर तालाब" की सैर

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मेहरानगढ़ दुर्ग से 4 बजे वापिस आ गए रात 11:45 की ट्रेन जोधपुर जैसलमेर एक्सप्रेस से हमे जैसलमेर जाना है। इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

खाना पीना खा कर हम 10:30 बजे ही जोधपुर स्टेशन पहुँच गए। और ट्रेन का इन्तजार करने लगे लगभग 11 बजे ट्रैन प्लेटफार्म पर आयी। हम जर्नल में बैठ गए कुछ ज्यादा भीड़ नहीं थी सीट आसानी से मिल गयी। लेकिन हम सीट पर नहीं बैठे ऊपर की सीट पर जाकर लेट गए। ठीक समय पर ट्रेन चली। और बाहर का नज़ारा तो कुछ दिख नहीं रहा था इसलिये थोड़ी देर बाद ही नींद आ गई। लगभग सुबह 3:45 पर आँख खुली तो पोखरण रेलवे स्टेशन पर ट्रेन खड़ी थी अभी जैसलमेर दूर है तो मैं फिर सो गया। अब आंख खुली सुबह 5:00 बजे ट्रैन लगभग खाली हो चुकी थी। तो हम नीचे आकर सीट पर बैठ गए पास बैठे एक सहयात्री से पता किया श्री भादरिया लाठी स्टेशन निकल गया अगला स्टेशन जैसलमेर है। जैसलमेर राज्य भारत के पश्चिम भाग में स्थित थार के रेगिस्तान के दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में फैला हुआ था। मानचित्र में जैसलमेर राज्य की स्थिति  20001 से 20002 उत्तरी अक्षांश व 69029 से 72020 पूर्व देशांतर है। परंतु इतिहास के घटनाक्रम क…

दिल्ली से जोधपुर

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जिनके खून में घुमक्कड़ी होती है उनको न समय की चिंता होती है न ही पैसों की परवाह। चाहे मौसम अनुकूल हो या प्रतिकूल उन्हें इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वो तो बस एक आज़ाद पंछी की तरह नील गगन में ऊंचाइयों के शिखर पर उड़ता ही जाता है। ऐसी ही 9 फरवरी 2015 को मेरे मन में विचार आया इस बार राजस्थान की तरफ जाना चाहिए.!! तभी गौरव को फ़ोन किया मैंने कहा भाई इस बार राजस्थान जाना है बता कहाँ चले वो छूटते ही बोला जोधपुर चलते है फिर वहां से जैसलमेर चलेंगे। मैंने कहा ठीक है और दो दोस्त ओम और राजेश को फोन किया दोनों जाने के लिए तैयार हो गए। अब हम चार लोग है जाने के लिये 12 फरवरी 2015 को मंडोर एक्सप्रेस से जाने का आरक्षण करवा लिया। वैसे तो घुमक्कड़ को कोई फर्क नहीं पड़ता के आरक्षण हो या सामान्य लेकिन बस थोड़ा भीड़-भाड़ से बचना चाहता था और राजेश को जर्नल में जाने का बिलकुल भी अनुभव नहीं है। दो दिन बीत गए 12 फरवरी आयी मंडोर एक्सप्रेस रात में 9:15 पर चलती है तो पहले ही सबको कह दिया था के समय से पहुंच जाना भई आरक्षण था तो इसलिए ढूंढने में भी कोई दिक्कत नहीं हुई मैं सबसे पहले अपने डिब्बे के पास पहुंचा फिर गौरव आया …