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Showing posts from September, 2016

सपनो का शहर शिमला: भाग 2

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आपने अब तक पढ़ा कि कल हम कालीबाड़ी मंदिर, मॉल, और रिज गए और लौटते वक्त हमे शाम के 8 बज गए फिर हम खाना खा के सो गए। इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।
लगभग सुबह 5 बजे उठा तो रजाई से बाहर निकलते ही काफी ठण्ड लगने लगी। लेकिन जल्दी से मुह हाथ धोया और सुबह लगभग 6 बजे ही निकल दिए फिर वही रेलवे स्टेशन तो हमारे रस्ते का मिडवे बन गया था रिज़ पर होते हुए हम पहुच गए जाखू मंदिर के रस्ते पर। मनमोहक द्रश्य से गुजरते हुए हम पहुंचे जाखू मंदिर। इतनी ऊँची मूर्ति मैंने अपने जीवन में पहली बार देखी आनंद आ गया।
कहते है कि जब हनुमन जी संजीवनी बूटी लेने के लिए जा रहे थे, तब उन्होंने ऋषि राक्ष को तपस्या करते देखा। तो वह संजीवनी का पता जानने के लिए इस पर्वत पर उतरे और उन्हें (राक्ष+याक+याकू=जाखू) नाम पड़ा। आप कभी शिमला आयें तो यहाँ जरुर आयें।











जाखू के बाद मैं पैदल ही चल पड़ा और पहुँच गयेया इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज यह पहले राष्ट्र्पति निवास हुआ करता था मैं आपको इतिहास के बारे में तो नहीं बताऊंगा लेकिन है इतनी मस्त जगह जिसका कोई जवाब नहीं। इसमें सुन्दर गार्डन है और मियुजियम में क…

सपनो का शहर शिमला

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लगभग सुबह 11:30 मैं नाभा हाउस कार्यालय पहुंचा रात जर्नल डिब्बे में फिर सुबह खिलौना ट्रैन में सफर करके काफी थकावट हो गई तो थोड़ा आराम करना तो बनता है। इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।

लगभग 1 बजे तक सोया फिर भूख लगने लगी हर्षद जी के पास गया तो उन्होंने कहा भोजन कर लो कार्यालय में बढ़िया घिया की सब्ज़ी और रोटी बनी है। वैसे तो मुझे घिया की सब्जी अच्छी लगती है लेकिन अपने धर्मपाल जी ने इतनी बढ़िया सबजी बना रखी थी के, मैं 2 दिन तक लगातार घिया की सब्ज़ी खा सकता हूँ। बस शर्त इतनी है कि सब्ज़ी केवल धर्मपाल जी ने बनाई हो। खाना खा पी कर मैंने हर्षद जी को कहा के भाई ले चलो कही घुमाने तो वो बोले आप तैयार हो जाओ मैं भी 2:30 बजे तक अपना काम निपटा लेता हूँ। मैं नहा धो कर फ्रेश हो गया। शुक्र है कार्यालय पर गर्म पानी का सोलर प्लांट लगा है नहीं तो बस पंचास्नान ही करना पड़ता।
फिर 2:30 बजे हम दोनों निकल पड़े थोड़ा ऊपर चले तो फिर रेलवे स्टेशन आ गया। दुबारा रेलवे स्टेशन देखकर अच्छा लगा। हर्षद जी ने बताया अब हम जहाँ भी घूमने जायँगे तो यह स्टेशन मिलेगा ही। बस 103 के पॉइंट पर जायेंगे तो स्टे…

दिल्ली से शिमला

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जुलाई 2016 का महीना है और छोटे भाई अर्पित का किसी विद्यालय में दाखिला भी करवाना है। घर वालों का कहना है कि किसी आवासीय विद्यालय में ही दाखिला करवाना है।उन्होंने यह भी कहा अगर देहरादून और शिमला में कोई विद्यालय हो तो बहुत अच्छा है.!! अब देहरादून से तो मैंने भी पढाई की है तो क्यों न इस बार छोटे भाई को पढाई के लिए शिमला भेजा जाये.!! तो मैंने वहां के अपने मित्र हर्षद से बात की तो उन्होंने बताया के यहाँ सरस्वती विद्या मंदिर है अच्छा स्कूल है, एक बार आकार देख लो। तो मैंने घर वालों को कहा अगर घर से पाप मम्मी स्कूल देख आये तो अच्छा रहेगा, लेकिन घर वालों ने यह जिम्मेदारी भी मेरी ही लगा दी। अब स्कूल देखने मुझे ही जाना है। तो सोचा इस बहाने घुमक्कड़ी भी हो जायेगी। वैसी भी घुमक्कड़ी तो किसी भी मौके पर की जा सकती है।
मैंने ऐसा तय किया कि आज रात ही शिमला जाऊंगा स्कूल देखने। ख़ास बात यह भी है के अब से पहले मैं कभी शिमला गया भी नहीं हूँ। कब शाम हो गई पता भी नहीं लगा मैंने जल्दी से सामान पैक किया और घर चला गया चांदनी चौक। घर जाकर खाना पीना खाया और लगभग 9 बजे स्टेशन पहुँच गया। अभी ट्रैन नहीं आई 1 घंटे देर…

अमरनाथ यात्रा: पिस्सू टॉप से शेषनाग

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पिस्सू टॉप की चढ़ाई से घबराकर कपिल खच्चर करता है और कहता है कि पिस्सू टॉप पर मिलेगा। लेकिन वह नहीं मिला हमने उसका पिस्सू टॉप पर भंडारे में नाम भी बुलवाया लेकिन वह नहीं मिला हम यह सोच कर आगे बढ़ गए चलो शेषनाग मिल जाएगा। इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।

मन में सिर्फ कपिल ही घूम रहा था हम आगे तो बढ़ रहे थे लेकिन बहुत ही चिंता थी। लेकिन थोड़ी देर बाद जब हम शेषनाग झील पहुंचे तो उसे देख कर मंत्र मुक्त हो गए। बिल्कुल नीला पानी और आसपास ग्लेशियर साथ में कई हजार मीटर ऊंचे पहाड़ ऐसा लग रहा था मानो हम आसमान में हैं और सारी धरती नीचे। जब ऐसा विचार मन में आता है तो मन भी बहुत ऊंची उड़ान भरना शुरू होता है। वह एहसास शब्दों में बयां करने वाला नहीं होता वह तो बस महसूस किया जा सकता है। और मैं भी महसूस कर रहा था।
अमरनाथ यात्रा में इस शेषनाग झील का खासा महत्व है। यह झील चंदनवाडी से लगभग 16 किलोमीटर दूर है। अंकित मैं और प्रमोद पिछले 16 किलोमीटर से लगातार पैदल चल रहे हैं। और एक कपिल है जो अभी युवावस्था में ही है, और वह घबराकर खच्चर पर बैठ कर आगे बढ़ जाता है। खैर.!! यह झील सर्दिय…