Sunday, 21 August 2016

जैसलमेर की शान "जैसलमेर दुर्ग"

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'चरथ भिक्‍खवे!'' जिसका अर्थ है - भिक्षुओ! घुमक्कड़ी करो। यह सच ही लगती है। वास्तव में घुमक्कड़ी से मन भी बहुत शांत और प्रसन्न रहता है। जैसलमेर की गलियां ऐसी लग रही है मानो हम सोने की खदानों में चल रहे हों। धीरे धीरे धुप का ताप भी बढ़ रहा है लेकिन इस बात से घुमक्कड़ों को कोई फर्क नहीं पड़ता। दिन के लगभग 1 बज है। हम जैसलमेर दुर्ग पहुँचते है। दुर्ग में प्रवेश से पहले कलाकृत्यों से सुसज्जित गलियों से होकर गुज़ारना पड़ता है वहां हाथ के द्वारा बनाई गई कलाकृतियों की दुकानें हैं जो दुर्ग की शोभा बढ़ा रही है। एक ख़ास बात इन गलियों में लोगो के घर भी बने हुए है।

जैसलमेर दुर्ग स्थापत्य कला की दृष्टि से उत्तमकोटि का स्थानीय दुर्ग  है। इस दुर्ग का निर्माण 1156 में शुरू हुआ यह दुर्ग 250 फीट तिकोनाकार पहाडी पर स्थित है। इस पहाडी की लंबाई 250 फीट व चौङाई 750 फीट है। जैसलमेर दुर्ग पीले पत्थरों के विशाल खण्डों से बना हुआ है। पूरे दुर्ग में कहीं भी चूना या गारे का इस्तेमाल नहीं किया गया है। मात्र पत्थर पर पत्थर जमाकर फंसाकर या खांचा देकर रखा हुआ है। दुर्ग की पहाडी की तलहटी में चारों ओर 25 से 20 फीट ऊँचा घाघरानुमा परकोट खिचा हुआ है, इसके बाद 200 फीट की ऊँचाई पर एक परकोट है, जो 10 से 156 फीट ऊँचा है। इस परकोट में गोल बुर्ज व तोप व बंदूक चलाने हेतु कंगूरों के बीच बेलनाकार विशाल पत्थर रखा है।वैसे तो दुर्ग में कई महल (विलास) है लेकिन एक "सर्वोत्तम" विलास जो एक अत्यंत सुंदर व भव्य इमारत है, जिसमें मध्य एशिया की नीली चीनी मिट्टी की टाइलों व यूरोपीय आयातित कांचों का बहुत सुंदर जड़ाऊ काम किया गया है। इसे वर्तमान में "शीशमहल" और "अखैविलास" के नाम से भी जाना जाता है। यह दुर्ग ऐसी जगह के हर किसी का मन मोह लेगी और उसका लगाव जैसलमेर से हमेसा हो जायेगा वो बार बार जैसलमेर जाने का कार्यक्रम बनायेगा।



दुर्ग के बाहर गली में चरखा



दुर्ग के बाहर मैं

गली में एक घर विवाह का निमंत्रण देने की अदभुत शैली



कभी आप भी जैसलमेर में घुमक्कड़ी करके आइये बहुत मज़ा आएगा लेकिन इतना सारा सोना देखकर मन में लालच को मत आने देना इसके बाद हम लौद्रवा जैन मंदिर गए।
अगले भाग में जारी...

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