दिल्ली से शिमला

जुलाई 2016 का महीना है और छोटे भाई अर्पित का किसी विद्यालय में दाखिला भी करवाना है। घर वालों का कहना है कि किसी आवासीय विद्यालय में ही दाखिला करवाना है।उन्होंने यह भी कहा अगर देहरादून और शिमला में कोई विद्यालय हो तो बहुत अच्छा है.!! अब देहरादून से तो मैंने भी पढाई की है तो क्यों न इस बार छोटे भाई को पढाई के लिए शिमला भेजा जाये.!! तो मैंने वहां के अपने मित्र हर्षद से बात की तो उन्होंने बताया के यहाँ सरस्वती विद्या मंदिर है अच्छा स्कूल है, एक बार आकार देख लो। तो मैंने घर वालों को कहा अगर घर से पाप मम्मी स्कूल देख आये तो अच्छा रहेगा, लेकिन घर वालों ने यह जिम्मेदारी भी मेरी ही लगा दी। अब स्कूल देखने मुझे ही जाना है। तो सोचा इस बहाने घुमक्कड़ी भी हो जायेगी। वैसी भी घुमक्कड़ी तो किसी भी मौके पर की जा सकती है।

मैंने ऐसा तय किया कि आज रात ही शिमला जाऊंगा स्कूल देखने। ख़ास बात यह भी है के अब से पहले मैं कभी शिमला गया भी नहीं हूँ। कब शाम हो गई पता भी नहीं लगा मैंने जल्दी से सामान पैक किया और घर चला गया चांदनी चौक। घर जाकर खाना पीना खाया और लगभग 9 बजे स्टेशन पहुँच गया। अभी ट्रैन नहीं आई 1 घंटे देरी से चल रही है। प्लेटफॉम की सीधी पर इन्तजार करना बहुत बेकार लग रहा है, बार बार मेरी नजर मोबाइल की घडी पर जाती समय पता नहीं क्यों आज शायद धीरे धीरे चल रहा है। खैर ट्रैन आई मेरे पास सामान्य श्रेणी का टिकट है तो सोचा था के ऊपर वाली सीट पर बैठ जाऊंगा लेकिन यह क्या ट्रैन तो खचाखच भरी हुई है। जैसे तैसे एक सीट मिली जिसपर एक युवक सो रहा है उसको उठाया तो उठ नही रहा था। लेकिन मैंने भी ठान ली थी अब तो उसको उठा कर इसी सीट पर बैठना है। उसको धक्का देकर उठाया तो बहस हो गई कहने लगा नहीं हटूंगा जो कर सको कर लो फिर मैंने कुछ नहीं बोला और उसको थोड़ा और धक्का देकर सीट पर बैठ गया। वो थोड़ी देर बड़बड़ा कर चुप हो गया।

उसको पानीपत जाना है अब जब वो पानीपत उतरेगा तो मुझे सोने का सौभाग्य प्राप्त होगा। जैसे तैसे ट्रैन पानीपत पहुंची यहाँ काफी सवारी उतर गई और वह भी उतर गया। कुछ देर बाद नींद रानी ने मेरी आँखों में दस्तक देदी और मैं सो गया।सुबह घडी में 5 बज रहे थे और ट्रैन कालका रेलवे स्टेशन पर खड़ी थी अँधेरे में पहाड़ी पर लोगों के घर चमक रहे थे बिलकुल देखने लायक नज़ारा था इतने में ही लोग कहने लगे भाई जल्दी से उतरो शिमला की टिकट लेकर कालका शिमला टॉय ट्रेन में सीट भी लेनी है। अरे वाह सीट के लिए लोग भाग रहे रहे है। मैंने भी थोड़ा जल्दी में शिमला की टिकट ली और ट्रेन में जब गया तो आसानी से सीट मिल गई।

कुछ ही देर में ट्रेन चलने लगी और लगभग 10 मिनट में ही ट्रेन पहाड़ पर आ गई। 10-15 की स्पीड में चल रही ट्रैन मुझे दिल्ली के बाल भवन की याद दिला रही है मेरा मन तो रेल संग्रहालय  में ही पहुँच गया ट्रैन थोड़ी आगे बढ़ी तो सुन्दर दृश्य दिखने शुरू हो गए, और फिर पहला स्टेशन आया टकसाल और फिर लगातार थोड़ी थोड़ी देर में स्टेशन आने लगे गुम्मन, कोटि, सोनवाडा फिर आया धर्मपुर हिमाचल यहाँ पास ही से इतना बढ़िया नजारा दिखा जिसे देखकर दिल खुश हो गया। पहाड़ पर से ऐसी सड़क दिखी बिलकुल घुमावदार महिंद्रा कार के विज्ञापन में ऐसा नजारा देखने को मिलता था।





आपको थोड़ा इस खिलौना गाडी के बारे में बता देते है। ब्रिटिश शासन की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला को कालका से जोड़ने के लिए 1806 में दिल्ली अंबाला कंपनी को इस रेलमार्ग के निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। समुद्र तल से 656 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कालका (हरियाणा) रेलवे स्टेशन को छोड़ने के बाद ट्रेन शिवालिक की पहाड़ियों के घुमावदार रास्ते से गुजरते हुए 2076 मीटर ऊपर स्थित शिमला तक जाती है।
दो फीट छह इंच की इस नैरो गेज लेन पर 9 नवंबर, 1906 से आजतक रेल यातायात जारी है। कालका-शिमला रेलमार्ग में 103 सुरंगें और 769 पुल बने हुए हैं। इस मार्ग पर 919 घुमाव आते हैं, जिनमें से सबसे तीखे मोड़ पर ट्रेन 48 डिग्री के कोण पर घूमती है। ख़ास बात यह है के 24 जुलाई 2008 को इस रेल मार्ग को विश्व धरोहर में शामिल किया गया।




खैर धर्मपुर और कुमार हट्टी के बाद आया बड़ोग स्टेशन ख़ास बात यह है कि अंग्रेजों ने इस रेल ट्रैक पर जब काम शुरू किया तो बड़ोग में एक बड़ी पहाड़ी की वजह से ट्रैक को आगे ले जाने में दिक्कतें आने लगीं। एक बार तो हालात यह बन गए कि अंग्रेजों ने इस ट्रैक को शिमला तक पहुंचाने का काम बीच में ही छोड़ने का मन बना लिया। इस वजह से ट्रैक का काम देख रहे कर्नल बड़ोग ने आत्महत्या तक कर ली। उन्हीं के नाम पर आज बड़ोग स्टेशन का नाम रखा गया है। और यहाँ ट्रैन थोड़ी देर तक रूकती है ताकि लोग कुछ खा पी लें। अभी रास्ता और लंबा है तो बिना कुछ खाये पिए शरीर की गाड़ी भी कहा चलती है।

ऐसी छोटी बड़ी कई सुरंग आती है
 बड़ोग के बाद आया सोलन शहर दूर से उस शहर को देखकर दिल खुश हो गया पहाड़ी से चारों तरफ घर ही घर नज़र आ रहे थे। सोलन को मशरूम सिटी भी कहा जाता है और कहते है कि इस शहर का नाम माता शूलिनी के नाम पर सोलन पड़ा। आगे चलते है तो और मनमोहक दृश्य जो सुख का अहसास कराते है जैसे आप कही स्वर्ग की यात्रा कर रहें हो। सोलन के बाद फिर सलोगड़ा, कांडाघाट, कानोह, कैथलीघाट, शोघी और फिर तारादेवी का स्टेशन आया यहाँ माँ तारा देवी का मंदिर है तारा देवी माँ दुर्गा की नौंवी बहन है तथा यह मंदिर हिमाचल के प्रमुख मंदिरों में से एक है। यहाँ ट्रैन रुक गई पहाड़ी का नज़ारा देखने लायक है मन ने कहा क्यों न कुछ फोटो ली जाये और मैं ट्रैन से उतर कर फोटो लेने लगा, तभी अचानक ट्रैन चल पड़ी अरे थोड़ा दौड़ कर ट्रैन में चढ़ा जिस कारण से अपने स्कूल की याद आ गई  वहां भी हम ब्लू लाइन बसों म भाग- भाग कर बस पकड़ा करते थे।

सोलन शहर




इसके बाद जतोग आया यहाँ से शिमला शहर दिखने लगा वाह क्या जगह है जुलाई में ढंड लगने लगी कुछ ही मिनटों में समरहिल के बाद आया शिमला शहर स्टेशन किसी टूरिस्ट पॉइंट से कम नहीं है।






और वही अपने मित्र हर्षद मिल गए उनके साथ मैं पैदल ही चला स्टेशन से थोड़ा नीचे ही है नाभा हाउस वहां अपना कार्यालय है जहाँ मेरी रुकने की व्यवस्था हर्षद जी ने की। वाह ऐसा घर तो मैंने पहली बार देखा जिसमे ऊपर से नीचे की और जाते है वाह गज़ब।

आगे शिमला में भी कई जगह जाना हुआ अगले भाग में जारी...

Comments

  1. यात्रा का वर्णन और फोटोग्राफी बहुत ही सुन्दर है। इसी तरह आगे की यात्रा का इंतज़ार रहेगा।

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  2. धन्यवाद जी जल्द ही अगला भाग मिलेगा

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  3. मस्त हैं ।। पिक्चर नयनाभिराम। हर स्टेशन पर रुक कर दिन बिताएंगे

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  4. बहुत बढ़िया हितेश जी

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  5. सुंदर नयनाभिराम दृश्य। हालांकि मैंने ऐसे यात्रा वृतांत बहुत कम पढ़े हैं पर आपका कहने का अंदाज़ सहज और सरल है।आगे पढ़ने की उत्सुकता बनी रहेगी।

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  6. शिमला की तो बात निराली है । आपका फोटो बढिया है ।फोटो बहुत कहती है ।

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  7. यात्रा व्र















    यात्रा का वर्णन लो अच्छा है ही, तस्वीरें बेहद खूबसूरत है।


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  8. बहुत ही बढ़िया और सरल भाषा में यात्रा वर्णन ...घूमने का मन हो आया

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