Sunday, 25 September 2016

सपनो का शहर शिमला

सपनो का शहर शिमला

लगभग सुबह 11:30 मैं नाभा हाउस कार्यालय पहुंचा रात जर्नल डिब्बे में फिर सुबह खिलौना ट्रैन में सफर करके काफी थकावट हो गई तो थोड़ा आराम करना तो बनता है। इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।

लगभग 1 बजे तक सोया फिर भूख लगने लगी हर्षद जी के पास गया तो उन्होंने कहा भोजन कर लो कार्यालय में बढ़िया घिया की सब्ज़ी और रोटी बनी है। वैसे तो मुझे घिया की सब्जी अच्छी लगती है लेकिन अपने धर्मपाल जी ने इतनी बढ़िया सबजी बना रखी थी के, मैं 2 दिन तक लगातार घिया की सब्ज़ी खा सकता हूँ। बस शर्त इतनी है कि सब्ज़ी केवल धर्मपाल जी ने बनाई हो। खाना खा पी कर मैंने हर्षद जी को कहा के भाई ले चलो कही घुमाने तो वो बोले आप तैयार हो जाओ मैं भी 2:30 बजे तक अपना काम निपटा लेता हूँ। मैं नहा धो कर फ्रेश हो गया। शुक्र है कार्यालय पर गर्म पानी का सोलर प्लांट लगा है नहीं तो बस पंचास्नान ही करना पड़ता।

मैं कार्यालय में
फिर 2:30 बजे हम दोनों निकल पड़े थोड़ा ऊपर चले तो फिर रेलवे स्टेशन आ गया। दुबारा रेलवे स्टेशन देखकर अच्छा लगा। हर्षद जी ने बताया अब हम जहाँ भी घूमने जायँगे तो यह स्टेशन मिलेगा ही। बस 103 के पॉइंट पर जायेंगे तो स्टेशन नहीं सिर्फ पटरी मिलेगी। स्टेशन से थोड़ा ऊपर चढ़े तो हाईवे आ गया फिर वहां से बाएं हाथ की और गए तो हिमाचल विधानसभा आई। हर्षद जी हर जगह की जानकारी देते हुए एक गाइड की भांति मुझे शिमला दर्शन करवा रहे थे। और ख़ास बात यह है यहाँ कोई स्वछ भारत अभियान जोरो पर है जिसका ख्याल यहाँ के लोग भलीभांति रखते है।


शिमला विधान सभा के बाहर


कुछ ही मिनटों में हम चहलकदमी करते हुए बड़े डाकघर के पास पहुंचे फिर वहां स्कैंडल पॉइंट गये यहाँ हमे एक बैटनी कैस्टल की हवेली मिली। हर्षद जी ने बताया कि यह हवेली बहुत पुरानी है। देखा तो वहां किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है। लेकिन हम शूटिंग देखने के लिए रुके नहीं और पहुँच गए कालीबाड़ी मंदिर यहाँ लकड़ी की प्रतिमूर्ति के रूप में माँ श्यामला देवी विराजमान है देवी श्यामला को माँ काली का ही अवतार माना जाता है। और कहते है कि शिमला शहर का नाम देवी श्यामला के नाम पर ही पड़ा है बाद में अंग्रेजों ने इसको शिमला कर दिया। श्यामला देवी के दर्शन करके मन प्रसन्न हो गया।

हवेली बैटनी कैस्टल 


माँ श्यामला कालीबाड़ी मंदिर



फिर वहां से नीचे उतर कर हम मॉल रॉड होते हुए रिज की ओर जा रहे है मॉल रॉड एक प्रकार से खरीददारी के लिए मुख्य क्षेत्र है। यहाँ का गोइटी थियेटर एक पुराने ब्रिटिश थियेटर की प्ररिकृति है। यह शिमला का सांस्कृतिक केंद्र बिंदु है। नाभा से यहाँ तक हम काफी चल लिए लेकिन एहसास ही नही हो रहा जैसे हम ज्यादा चलें हो पर मज़ा जरूर आ रहा है इस शहर बारे में नयी नयी चीजे जानने को मिल रही है। कुछ ही देर में हम पहुंचे "रिज़" यह कसबे के बीचोबीच विशाल खुला स्थान है, बहुत लोकप्रिय है और यहाँ से पहाड़ों के मनमोहक नाजारें देखे जाते है। बहुत सुंदर जगह है यहाँ लोग घंटों समय बिताते है। शाम को तो यहाँ लोगों का मेला सा लगा रहाता है। हर्षद जी ने बताया अंग्रेजों के शाशन के समय यहाँ अपने देश के लोगो का मना था। अंग्रेजों का कहना था कि Indians and Dogs are not Allowed मैं यह बात सुनकर चोंक गया। किंतु आज इस जगह पर हमारे देश का तिरंगा झंडा बड़ी शान से लहरा रहा है। हमने तो जोश में आकर भारत माता की जय का जयघोष भी लगाया। कसम से मज़ा आ गया। दिन ढल चुका है लक्कड़ बाजार होते हुए लोअर बाजार में वह सुरंग आई जिसमे से ब्रिटिश शाशन काल में जाने की अनुमति थी मतलब ऊपर मॉल रॉड से रिज कोई नहीं जाता था भारतीय सिर्फ नीचे ही रहते थे।





अपने मित्र हर्षद जी




वह सुरंग जिसमे से ब्रिटिश काल में भारतीय जाते थे

रिज़ पर हमारा कारनामा



फिर हम वापिस रेलवे स्टेशन होते हुए कार्यालय आ गए लगभग 8:00 बज रहे होंगे खाना भी तैयार है। हाथ पैर धोकर खाना खाया अब थकावट भी ज्यादा होने लगी और नींद भी आने लगी कल जाखू मंदिर और एडवांस स्टडी जाना है तो मैं जल्दी ही रिज़ाई में घुसकर सो गया।

अगले भाग में जारी...

5 comments:

  1. सुंदर वर्णन

    ReplyDelete
  2. घुमने जाना पड़ेगा। इससे पहले की ठण्ड पड़ जाये।

    ReplyDelete
    Replies
    1. ठण्ड में भी घूमने का अलग ही आनंद है।

      Delete
  3. वाह बहुत सुन्दर अगली बार मैं भी चलूँगा आपके साथ

    ReplyDelete