नन्हे कदम, विशाल हिमालय: अक्कू की आदि कैलास यात्रा भाग -1

कई यात्राएँ हम प्लान करके करते हैं, लेकिन कुछ यात्राएँ खुद हमें बुलाती हैं। आदि-कैलास की यह यात्रा भी कुछ ऐसी ही थी।

हमारी कंपनी Wheelsfly पिछले कई वर्षों से अलग-अलग तरह की रोड ट्रिप और बाइक एक्सपीडिशन आयोजित करती आ रही है। इस बार भी हमारा आदि कैलास बाइक एक्सपीडिशन पूरे जोरों पर चल रहा था। हमारी एक टीम पिछले लगभग एक महीने से पिथौरागढ़ में ही डेरा जमाए हुए है, और लगातार एक के बाद एक, चार सफल एक्सपीडिशन पूरे कर चुकी है। 

19 जून 2026 की शाम मैं ऑफिस में बैठा था। अचानक मन में ख्याल आया ये इस सीज़न का आखिरी एक्सपीडिशन बचा है। उसके बाद बरसात शुरू हो जाएगी और फिर कई महीनों तक आदि कैलास का रास्ता बंद हो जाएगा। मैंने तुरंत प्रियंका से कहा, “सुनो, इस बार हम भी चलते हैं। अपनी 4×4 Scorpio N से ग्रुप के साथ ही चलते हुए पूरा सफर भी एंजॉय करगे और टीम का हौंसला भी बढ़ेगा। 

मेरी बात सुनते ही प्रियंका की पहली चिंता हमारी डेढ़ साल की बेटी अक्कू थी। उसने कहा, “इतनी छोटी बच्ची… इतनी ऊँचाई… और इतना लम्बा सफ़र कैसे होगा?”

मैं मुस्कुरा दिया। मैंने कहा, “अरे, अक्कू के खून में ही घुमक्कड़ी है। जब ये पेट में थी, तब स्पीति वैली घूम आई थी। ये भी हो जाएगा चिंता मत करो और अगर कुछ हुआ भी तो हम साथ तो है देख लेंगे।”

प्रियंका मान गई।

अब सोचा कि अगर दो लोग और साथ हो जाएँ तो सफर भी मजेदार रहेगा और खर्च भी बंट जाएगा। मैंने तुरंत अपने दोस्त रमन को फोन लगाया। उधर से बिना एक मिनट लगाए जवाब आया, “मैं तो तैयार हूँ।”

फिर उसने कहा, “मेरी एक दोस्त भी चलेगी… उसका नाम चैताली है।”

मैं चैताली को बिल्कुल नहीं जानता था, लेकिन यात्रा की यही तो खूबसूरती होती है। कई बार रास्ते ऐसे लोगों से मिलवा देते हैं जो बाद में अच्छी यादों का हिस्सा बन जाते हैं।

अब हमारी टीम पूरी हो चुकी थी—मैं, प्रियंका, हमारी डेढ़ साल की नन्ही बिटिया अक्कू, रमन और चैताली।

लेकिन इस पूरी यात्रा का सबसे खास किरदार कोई और नहीं, बल्कि हमारी छोटी-सी अक्कू थी।

शायद यह पहली बार होने वाला था कि मात्र डेढ़ साल की बच्ची आदि कैलास जैसी कठिन यात्रा पर अपने माता-पिता के साथ जाने वाली थी। घर वालों से लेकर दोस्तों तक, सभी का एक ही सवाल था—“इतनी छोटी बच्ची को लेकर सच में जाओगे?”

लेकिन मैं अक्कू को जानता था। वह जन्म से ही यात्राओं की साथी रही है। गाड़ी में बैठना, नए रास्ते देखना, पहाड़ों की हवा महसूस करना… उसे भी उतना ही पसंद है जितना हमें।

हमारी एक टीम पिछले एक महीने से पिथौरागढ़ में डेरा जमाए हुए है और लगातार बैक टू बैक आदि कैलास के बाइक एक्सपीडिशन करवा रही है। मैंने बिना देर किए सभी के आधार कार्ड प्रभात को भेज दिए, ताकि इनर लाइन परमिट समय पर बन जाए। प्रभात हमारी टीम का हिस्सा है और अभी वहीं पिथौरागढ़ में है। 

20 जून की सुबह प्रभात का मैसेज आया—“भैया, सबके परमिट बन गए हैं।”

बस फिर क्या था…

पूरा घर मानो युद्ध स्तर पर तैयारी में जुट गया। बैग पैक हुए, कैमरे चार्ज हुए, जैकेट निकलीं, दवाइयाँ रखी गईं और सबसे ज्यादा तैयारी हुई अक्कू के सामान की।

उसके कपड़े, कंबल, खिलौने, दवाइयाँ, फीडिंग बोतल, सब कुछ बार-बार चेक किया जा रहा था। सच कहूँ तो हमारी तुलना में उसका सामान ज्यादा था।

उधर रमन एक दिन पहले ही मेरी Scorpio N अपने घर ले गया था ताकि अगली सुबह जल्दी आ सके और समय खराब न हो।

फिर आखिरकार वह सुबह आ ही गई जिसका इंतजार था।

21 जून 2026।

सुबह ठीक साढ़े पाँच बजे रमन घर पहुँच गया।

मैंने बिना समय गंवाए सामान गाड़ी में रखना शुरू कर दिया। पीछे की सीटों को फोल्ड करके उस पर सिंगल बेड का गद्दा बिछा दिया ताकि अक्कू और उसकी मम्मा प्रियंका पूरे रास्ते आराम से सफ़र कर सकें। पहाड़ों की लंबी यात्रा में छोटी-सी बच्ची के लिए इससे बेहतर इंतजाम हो ही नहीं सकता था।

करीब छह बजे हम अक्षरधाम से निकल पड़े।

दिल्ली की सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी और हमारी यात्रा शुरू हो चुकी थी।

इंदिरापुरम से चैताली को साथ लिया और फिर बिना रुके हमारी Scorpio N उत्तराखंड की ओर दौड़ने लगी।

पहला पड़ाव गड़गंगा के पास मामा यादव के मशहूर शिवा ढाबे पर था। गरमा-गरम आलू के पराठे, मक्खन और चाय ने सफर की शुरुआत को और भी शानदार बना दिया।

अक्कू भी सबको देखकर खिलखिलाती रही। ढाबे पर मौजूद लोग उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे। शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि इतनी छोटी बच्ची आदि कैलाश की ओर जा रही है।

नाश्ते के बाद फिर सफर शुरू हुआ।

पहाड़ धीरे-धीरे करीब आने लगे थे।

दोपहर का खाना हमने चम्पावत में खाया। तभी मौसम ने अचानक करवट ली। आसमान में काले बादल छा गए और हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई। पहाड़ों पर बारिश का अपना अलग ही जादू होता है। सड़कें चमक उठीं, चीड़ के पेड़ भीगे हुए और हवा में मिट्टी की खुशबू घुल गई।

शाम करीब चार बजे हम पिथौरागढ़ पहुँच गए मौसम भी साफ़ हो गया था। 

प्रभात ने पहले से ही हमारे ठहरने की शानदार व्यवस्था कर रखी थी। हमारा होटल एयरपोर्ट की रनवे के बिल्कुल पास था—होटल मूनलाइट।

रनवे की दीवार के साथ फैला हुआ हरा-भरा घास का बड़ा-सा मैदान किसी बुग्याल से कम नहीं लग रहा था।

अक्कू तो मानो वहीं की होकर रह गई।

कभी दौड़ती, कभी घास पकड़ने की कोशिश करती, कभी हँसते हुए हमारी तरफ भागती। हम दोनों बस उसे देखते रह गए। शायद इस पूरी यात्रा की सबसे खूबसूरत तस्वीरें कैमरे में नहीं, हमारी आँखों में कैद हो रही थीं।

सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे छिप रहा था और उसकी सुनहरी रोशनी अक्कू के चेहरे पर पड़ रही थी।

उस पल मुझे एहसास हुआ कि असली यात्राएँ सिर्फ मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं, बल्कि उन लम्हों को जीने के लिए होती हैं जिन्हें जिंदगी भर भुलाया नहीं जा सकता।

थोड़ी देर बाद मैं प्रभात के साथ बाइक से उस होटल पहुँचा जहाँ हमारे एक्सपीडिशन के सभी राइडर्स रुके हुए थे। सभी से मिला, उनका उत्साह बढ़ाया और अगले दिन की तैयारियों पर चर्चा की।

वापसी में सबसे जरूरी काम बाकी था।

आगे ऊँचाई वाले इलाकों में गाय का दूध मिलना लगभग नामुमकिन था। इसलिए एक मेडिकल स्टोर से अक्कू के लिए पाउडर मिल्क और सेरेलैक खरीद लिया। आखिर हमारी सबसे छोटी यात्री का पूरा ध्यान रखना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी थी।

रात को होटल लौटकर सभी ने साथ में खाना खाया।

बाहर हल्की ठंडी हवा चल रही थी।

कल से असली आदि कैलाश एक्सपीडिशन शुरू होने वाला था।

बाइक राइडर्स अपनी बाइकों पर होंगे…

और हम अपनी Scorpio N में, उसी कारवां का हिस्सा बनकर।

लेकिन मन में सबसे बड़ा सवाल यही था…

क्या हमारी नन्ही अक्कू सचमुच इस कठिन हिमालयी सफर को उतनी ही मुस्कुराहट के साथ पूरा कर पाएगी, जितनी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर आज थी?

इस सवाल का जवाब हमें अगली सुबह मिलने वाला था। 

दोस्तों बने रहिए अगले भाग में आपको आगे के सफ़र की कहानी बताऊंगा। 

आपका हमसफ़र, आपका दोस्त 
हितेश शर्मा

अक्कू मैं और प्रियंका रास्ते में कहीं
मैं प्रियंका और हमारी नन्ही अक्कू 

अक्कू अपनी मम्मा के साथ होटल में 

पिथौरागढ़ में अक्कू अपनी मम्मा के साथ बुग्गयाल में खेलते हुए 




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