ए क्लोज़ एनकाउंटर विद ब्लैक आइस

बर्फ देखने मे तो बहुत आकर्षित करती है लेकिन हक़ीक़त में बर्फ बहुत खरतनाक होती है चाहे ताज़ी हो या पुरानी।

उस दिन बहुत भीषण बर्फ पड़ी थी। 4-5 फीट जम गई होगी ट्रैक पर। कई जगह तो पूरा पैर बर्फ में जाता, तो कई जगह घुटने तक। कुछ जगह तो बर्फ सिल्ली की तरह जमी हुई थी। क्रेम्पोन पहनने के बाद भी उस जमी हुई बर्फ पर पैर फिसलने से खुद को बचा नहीं पाया था मैं। ये सिलसिला चलता रहा 7-8 बार। मैं देख रहा था, कच्ची बर्फ़ पर लोग तो जानबूझकर भी फिसल रहें है। उठते-चलते फिर फिसलते। जैसे ये एक गली के छोटे बच्चों का खेल बन गया हो कि बार-बार रेत में लोटपोट होना है।

लेकिन जमी हुई ठोस बर्फ़ पर यह खेल हाथ पैर तुड़वा लिए जाने जैसा खतरनाक है।

ये गिरना 1-2 बार तो सहन हो सकता है। लेकिन उसके बाद ये बहुत जोखिम भरा और दुखदायी भी हो जाता है। मेरे भी हिप बॉन में लग गई थी, शरीर बता रहा था कि कोई इंटरनल इंजरी भी हुई है लेकिन एक जज़्बा था कि ट्रैक पूरा करना है। हौंसला बना रहा और मैं आगे बढ़ता रहा।

बर्फ़ के इलाकों के एक्सपीडिशन बेहद ख़तरनाक होते‌ हैं। मुझे अक्सर लोग कहते है , यार क्यों जाता है ऐसी जगह पर जहां कोई नहीं जाता.? हमे तो अपने घर मे बहुत शांति मिलती है। अगर कभी घूमना हुआ तो घूम आये परिवार के साथ शिमला, मनाली, मसूरी, दार्जलिंग आदि। सबसे पहले तो मेरा जवाब यही होता है कि कौन कहता है कि कोई नहीं जाता, ज़रा जाकर देखो ,कौन-कौन जाता है.?
एकबार यहाँ जाने पर शिमला मनाली सब भूल जाओगे इतनीं मन की शांति मिलती है यहां।
स्थान:- केदारकंठा ट्रैक
दिसम्बर 2017

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