Friday, 29 July 2016

वन विहार कार्यक्रम हरिद्वार, लच्छीवाला, पांवटा साहिब



जैसा की आपको पता है मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूँ तो संघ में भी घुमक्कड़ी का बड़ा महत्व है। लेकिन उसको यहाँ एक नाम दिया गया है वह नाम है वन विहार। ऐसा ही दिल्ली प्रान्त के तीन विभाग पश्चिमी दिल्ली, झंडेवाला विभाग (मध्य दिल्ली) और यमुना विहार विभाग (यमुना पार का क्ष्रेत्र) का एक वन विहार का कार्यक्रम बना 8,9,10 जुलाई को जिसमे हमे हरिद्वार डोईवाला ( लच्छीवाला) और पौंटा साहिब जाना था।
कार्यक्रम बहुत ही मज़ेदार होने वाला था तो अपने यमुना विहार विभाग से भी अच्छी खासी संख्या हो गई 53 स्वयंसेवक सभी को एक जगह इखट्टा करने के लिए अपने विभाग कार्यालय नन्द नगरी बुला लिया 8 जुलाई 2016 को रात 8:30 बजे बहुत हलचल थी कार्यालय पर थोड़ी देर बाद हमारे विभाग के सह विद्यार्थी कार्यवाह श्रीमान हरीश जी कार्यक्रम की भूमिका समझाने लगे वह बताने लगे के हम संघ के स्वयंसेवक है तो उसी तरह से कार्यक्रम पूरा करना है। वास्तव में जब इतनी संख्या में अगर कोई और संस्था कहीं लेकर जाती है तो उनके हाथ पाँव कांप जाते है लेकिन यह संघ का कार्यक्रम है तो यहाँ पहले से सब कुछ तय होता है, और संघ के स्वयंसेवक में व्यवस्था बनायें रखना अच्छे से आता है। तो भाई साहब ने कार्यक्रम की रुपरेखा सबको बतायी। लगभग 10 बज चुके थे सब मिल जुल कर भोजन करने लगे अपने नितिन जी बोले चलो भाई साहब गाडी में से हम अपना सामान निकल लाते है हम बाहर सामान निकालने गए और वापिस आकर कार्यकर्ताओं के साथ भोजन किया।
11:00 बजे अधिकारियों का इशारा हुआ के चलो बाहर बस खड़ी है वहां सभी बस में चलेंगे। जब बस तक स्वयंसेवक पहुँचे तो कुछ कहने लगे भाई साहब AC वाली बस बताई थी ये तो ऐसी ही है। आखिर ये तो समझने वाली बात है सिर्फ 500 रु शुल्क में कैसे AC वाली बस कैसे होती..???? और विभागों ने तो 1000 और  800 रु शुल्क लिया है। बस लगभग चल पड़ी 11:30 बजे और भोपुरा से पहले दिल्ली में ही डीज़ल भरवाया। दिल्ली में UP के मुकाबले पेट्रोल, डीजल के दाम सस्ते है। और उसके बाद अब बस रुकी सीधे ग़ाज़ियाबाद। पूछा तो जो बाकी दो विभाग है उनकी बस आ रही है थोड़ी देर बाद झंडेवाला की बस आयी और पश्चिमी की बस अभी बहुत पीछे थी शायद ITO के पास ही होगी तो ज्यादा इन्तजार करना ठीक नहीं समझा। और दोनों बस चल पड़ी मेरठ ही पहुची थी के वहां हमारी बस का पंचर हो गया करीब आधा घंटा टायर बदलने में चला गया और वह पश्चिमी की बस भी आ गई। फिर वहां से तीनो साथ चले और थोड़ी देर बाद हाईवे पर खतौली में अलखनंदा ढाबे पर बस रुकी वहां सबको चाय पिलवाई गई। फिर वहां से बस चल पड़ी। नींद भी काफी तेज़ आ रही थी अब मैं सो गया और जब थोड़ा दिन निकला तो बस रुड़की पहुँच गयी थी मुझे काफी तेज लघुशंका (पेशाब) आ रहा था। थोड़ी ही देर बाद करीब 5:30 बजे हरिद्वार आ गया। शंकराचार्य चौक के रास्ते बस सीधे ऋषिकेश रोड, भूपतवाला, निष्काम सेवा ट्रस्ट जाकर रुकी करीब 6 बज रहे होंगे। वहां जाते ही सबसे पहले लघुशंका के लिए गया फिर  देखा तो बहुत बढ़िया व्यवस्था एक AC हाल में गद्दे लगाये हुए थे ताकि सब एक साथ विश्राम कर सके। AC बस तो मिली नहीं लेकिन AC कमरे मिल जाने से स्वयंसेवक बहुत खुश नज़र आ रहे थे। थोड़ी देर बाद सभी स्नान के लिये पास ही गंगा घाट पर गये वहां से नाहा कर आये तो 2 सत्रों में बैठक थी जिसमे प्रवासी कार्यकर्ता निर्माण के विषयों पर चर्चा हुई।
दोपहर में भोजन के बाद करीब 2 बजे हम निकल पड़े। फिर वहां से सीधे पहुंचे भारत माता मंदिर। जहाँ 7 मंजिल मंदिर का दर्शन करने के बाद सभी स्वयंसेवक एक जगह मंदिर के प्रांगण में एकत्र होकर गीत भजन करने लगे। गीत भजन की गूंज से वहां का वातावरण मानो कृष्णमयी हो गया हो। मानो देवो के देव महादेव स्वयं वहां हमारे बीच में भजन कर रहे हो। भारत माता की जय के गगन भेदी जयघोष कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार करने लगे। उसके बाद हम हर की पौड़ी पहुंचे वहां स्नान करने लगे बहुत दिनों बाद मैंने भी गंगा स्नान किया था। उसके बाद गंगा माँ की पवित्र आरती में सबको सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। शाम के 8 बज चुके थे वहां से सीधे हम पहुंचे निष्काम सेवा ट्रस्ट जहाँ रुके थे। वहां भोजन किया फिर सो गए। क्योंकि पूरे दिन के थके हुए थे। अगले दिन का सफर शुरू हुआ सुबह 7:30 बजे से। हम वहां से अपना सारा सामान लेकर निकल पड़े अब दोबारा हरिद्वार नहीं आना था। फिर लगभग 8:30 बजे हम पहुंचे लच्छीवाला मैं वहां पहले भी कई बार गया हूँ लेकिन कई कार्यकर्ताओं का पहला अनुभव था जो वहां बहुत ही आनंद महसूस कर रहे थे वहां सब जमकर नहाएं, मस्ती करी प्रकृति का आनंद लिया। थोड़ी देर बाद हरीश जी शुरू हो गए चलो चलो जल्दी करो। जो कार्यकर्ता फोटो खींचते हरीश जी उनपर भड़क जाते। आखिर उनका भड़कना ठीक था आखिर देर जो हो रही थी। फिर वहां से डोईवाला पहुंचे पास ही था वहां हमने अल्पहार किया। संघ में नाश्ते को अल्पहार कहा जाता है। छोले भटूरे खाकर मज़ा आ गया जिसकी सारी तैयारी उत्तराखंड के स्वयंसेवक कार्यकर्ताओं ने ही करी थी। फिर वहां एक सत्र बैठक हुई जिसमें वहां के कार्यकर्ताओं का परिचय हुआ व आगामी कार्यक्रमो पर चर्चा हुई करीब 1 बज रहे होंगे फिर वह से सीधे पौंटा साहिब के लिए निकल पड़े लगभग 2 घंटे बाद हम पांवटा साहिब गुरूद्वारे पहुंचे।
पांवटा साहिब सिख धर्म में एक धार्मिक स्थल के रूप में प्रचलित है। यह हिमाचल के सिरमौर जिले के दक्षिणी ओर की तरफ यमुना नदी के तट पर स्थित है। गुरुद्वारा पांवटा साहिब सिख धर्म के दसवें सिख गुरु गोबिंदसिंह जी और सिख नेता बंदा बहादुर को समर्पित है। इसे पौंटा साहिब भी कहा जाता है जो पावंटा का ही अपभ्रंश रूप है। पांवटा  या 'पौंटा' का अर्थ होता है- 'पैर जमाने की जगह'। ऐसा माना जाता है कि गुरु गोबिंदसिंह जी आनन्दपुर में प्रस्थान करने से पहले पांवटा साहिब रुके थे और पांवटा साहिब में ही उन्होंने दसम ग्रंथ की रचना की थी। इस धार्मिक स्थल पर सोने से बनी एक पालकी है जो कि एक भक्त द्वारा ही यहां भेंट में दी गई थी।

श्री तलब स्थान और श्री दस्तर स्थान इस सिख मंदिर के अन्दर दो महत्त्वपूर्ण स्थान हैं। श्री तलब स्थान में वेतन बांटा जाता है और श्री दस्तर स्थान में पगड़ी बांधने की प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है।

गुरुद्वारे के परिवेश में एक संग्रहालय है जहां पर उस समय के हथियार और गुरु जी की कलम संरक्षित रखी गई है। गुरुद्वारे से एक पौराणिक मंदिर भी जुड़ा हुआ है जो कि यमुना देवी को समर्पित है। गुरुद्वारे के समीप कवि दरबार है जो कविताओं की प्रतियोगिता के लिए इस्तेमाल में आता है। खैर वहां हमने लंगर चखा उसके बाद गुरूद्वारे में गुरु की आराधना की फिर एक सत्र और बैठक का था यह समापन सत्र था। फिर वहां से निकले करीब 7 बज रहे थे और लगभग 7:30 बजे बस चली और सहारनपुर के रास्ते हम सब दिल्ली वापिस आ गए और यात्रा 11 जुलाई 2016 की सुबह दिल्ली में समाप्त हुई।


मेरठ में जब पंचर हुआ तब भी लग गए फोटो खींचने

अलखनंदा खतौली में चाय पीते हुए स्वयंसेवक

अलखनंदा खतौली में चाय का आनंद लेते बायें से ललित जी, हरीश जी, राजेश जी, दीपक जी और सागर जी

AC हॉल में मजेदार कक्ष व्यवस्था


भारत माता मंदिर में मैं

स्वयंसेवको के गगनभेदी गीत भजनों से गूंज उठा भारत माता मंदिर का प्रांगण

गीत करते हुए प्रान्त विद्यार्थी कार्यवाह श्रीमान राजेश जी




माँ गंगा की पवित्र आरती

लच्छीवाला वाटरफॉल

लच्छीवाला में मस्ती करते ललित जी के साथ स्वयंसेवक कार्यकर्ता

वाह मज़ा आ गया


लच्छीवाला में मस्ती करते स्वयंसेवक तथा बनियान में मैं

वाह मस्ती का समय

गुरुद्वारा श्री पांवटा साहिब

गुरुद्वारा श्री पांवटा साहिब

मस्ती करते निशांत जी

पांवटा साहिब में यमुना किनारे हम सभी


सभी एक साथ

बस में भी मस्ती

निष्काम सेवा ट्रस्ट के बाहर




Wednesday, 20 July 2016

अमरनाथ यात्रा: पहलगाम से पिस्सू टॉप

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें।

4 जुलाई 2015 की दोपहर में हम पहलगाम पहुँच गए। अमरनाथ यात्रा का आधार स्थल पहलगाम है तो यहाँ केंद्रीय रिज़र्व पुलिस के तंबू लगे है तो यात्रियों को एक रात के लिए तो यहाँ रुकना ही होता है। हम भी रुके रात को बाजार में से कुछ जरुरी सामान जैसे दस्ताने खरीदे। भंडारे में भोजन किया और हम सो गए। सुबह उठे लगभग 4 बजे फ्रेश हुए कुल्ला किया मुह धोया इसमें लगभग आधा घंटा चला गया। फिर हमने अपना सामान उठाया और निकल पड़े सुबह सुबह का नज़ारा देखने लायक था। एकदम मस्त लग रहा था। थोड़ी देर बाद ही 5 बज गए और ठीक 5 बजे पहलगाम से चंदनवाड़ी का रास्ता खुल गया हमने वहां से गाडी पकड़ी जो अपने अलग अलग हिसाब से पैसे मांग रहे थे कोई 150 कोई 100 लेकिन हमने सिर्फ 70 रु की गाडी की और चल दी चंदनवाड़ी की ओर जैसे आगे बढेगें तो रास्ते में एक जगह पड़ती है बेताब घाटी.!! बेताब घाटी में फिल्म बेताब की शूटिंग हुई थी वैसे यहाँ और भी कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है जैसे हैदर के भी कुछ सीन यहाँ के है। गाडी चल रही थी ये क्या देखते ही देखते गाडी रुक गयी बाहर जाम लगा था ड्राइवर को पूछा ये जाम कैसे है तो वो बोला लगभग 1 किलोमीटर आगे ही चंदनबाड़ी है काफी संख्या में लोगो का जाना होता है तो जाम लगना स्वभाविक ही है लेकिन बाबा बर्फानी के भक्तों को अपने जीवन चक्र चलाने वाले देवाधी महादेव बाबा अमरनाथ के दर्शन की इतनी जल्दी है के सब गाड़ियों से निकल कर चंदनवाड़ी की तरफ पैदल ही चल पड़े फिर हम कैसे पीछे रह जाते हमे भी ललख थी बाबा के दर्शन जल्द से जल्द करने की हम भी चल दिए पैदल। यहाँ सबके सामन की जाँच होती है सेना की बहुत चाक चौबंद व्यवस्था होती है वहां चेकिंग के तीन तीन राउंड पुरे करने होते है। हम तो अपना लगभग सारा सामान अंकल के घर ही छोड़कर आये थे



चंदनवाड़ी पर सुरक्षा घेरा

मैं,अंकित, प्रमोद और कपिल

अभी हमें भी सुरक्षा घेरा पार करना है


इसलिए कोई समस्या नहीं हुई। वैसे भी ट्रैकिंग करते हुए सामान काम से कम ही रखना चाहिए साथ। यहाँ पर अनेकों भंडारे थे जिसमें चारों तरफ नज़र घुमाने पर एक ही चीज दिख रही थी वह बाबा के भक्त है। चंदनवाड़ी से पैदल यात्रा शुरू होती है। चंदनवाड़ी पहलगाम से सोलह किलोमीटर दूर है। पैदल यात्रा मार्ग व पड़ाव ऐसे है - पिस्सू टॉप 3 किलोमीटर, फिर जोजपाल, शेषनाग, महागुनस, पौष पत्री, पंचतरणी, संगम और गुफा। पैदल यात्रा का पहला पड़ाव पिस्सू टॉप है। यह मार्ग तीन किलोमीटर का है लेकिन सबसे मुश्किल भी। ऊपर देखने पर जब सिर गर्दन को छूने लगे तो एक चोटी दिखती है, उसे पिस्सू टॉप कहते हैं। ध्यान से देखने पर वहां भी रंग-बिरंगी चींटियां सी चलती दिखती हैं। कई यात्री जो घर से सोचकर आते हैं कि हम पूरी यात्रा पैदल ही करेंगे, इस चोटी को देखते ही ढेर हो जाते हैं। जरा सा चढते ही खच्चर वालों से मोलभाव करते दिखते हैं।

कहते हैं कि कभी इस स्थान पर देवताओं का और राक्षसों का युद्ध हुआ था। देवता जीत गये। उन्होंने राक्षसों को पीस-पीसकर उनका ढेर लगा दिया। उस ढेर को ही पिस्सू टॉप कहते हैं। पिस-पिसकर लगे ढेर को पिस्सू नाम दे दिया।

यह रास्ता बेहद चढाई भरा है। ऊपर से पानी भी आता रहता है। खच्चर वाले भी सबसे ज्यादा इसी पर मिलते हैं, क्योंकि आगे का रास्ता अपेक्षाकृत आसान है।
हम अभी थोड़ी ही आगे बढे थे के कपिल थक गया बोला मैं खच्चर कर लेता हूँ पिस्सू टॉप मिलूंगा। हट्टा कट्टा कपिल पिस्सू टॉप तक पैदल नहीं चल पाया इससे आप अंदाजा लगा सकते है कैसी चढाई होगी। हम उसको छोड़कर आगे बढ़ निकलें थोड़ी देर बाद बहुत कठिन चढ़ाई चढ़ कर हम पिस्सू टॉप पहुंचे तो यहाँ कपिल नहीं मिला। हमने करीब 30 मिनट इन्तजार किया लेकिन कपिल नहीं आया।


पिस्सू टॉप पर मैं और अंकित प्रमोद कपिल का नाम बुलवाने भंडारे में गया

पिस्सू टॉप पर मैं

पिस्सू टॉप पर अंकित


फिर हमने उसका नाम एक भंडारे से बुलवाया लेकिन पता नहीं लगा। यह सोच कर हम आगे बढ़ चले के शेषनाग मिल जायेगा और मन में ठान लिया था के आज शेषनाग पार करके पंचतरणी पहुंचना है। नहीं पहुंचे तो आज रात शेषनाग ही रुकना पडेगा।
आगे देखते है हमे कपिल मिला या नहीं.?? क्या हम 1 बजे तक शेषनाग पर कर पाये या नहीं.???

Sunday, 17 July 2016

अमरनाथ यात्रा का आधार तथा पहला पड़ाव: पहलगाम

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें।

4 जुलाई 2015 की सुबह लगभग 12 बजे हम अंकल के घर से खाना खा पी के निकले ऑन्टी ने अपने भाई को पहले ही कह दिया था के के कल हमे पहलगाम छोड़ने जाना है। तो वह समय से गाड़ी लेकर आ गए थे। अभी थोड़ी आगे ही पहुचे थे के आसमान इतना सुन्दर लगने लगा था कि मेरे पास शब्द नहीं है लिखने को। नीला आसमान हमे ऐसा महसूस करा रहा था के जैसे हम आकाश गंगा में सैर कर रहे हो। करीब पौने दो घंटे में अनंतनाग पहुँच गए। जैसे ही अनंतनाग शुरू होता है सुरक्षा बलों और सेना का कड़क पहरा भी शुरू हो जाता है। ऐसा लगने लगता है जैसे सेना की छावनी हो। यह सब नज़ारे आँखे रूपी कैमरे में कैद करते हुए गाडी लिद्दर नदी के साथ साथ चल रही थी। यह लिद्दर नदी पहलगाम में चार चाँद लगा रही थी दूध जैसी इसकी निर्मल धारा मानो स्वर्ग से उतरकर धरती पर आ रही हो।

पहलगाम में मैं और भारत माता का एक वीर जवान

लिद्दर नदी के किनारे मैं

पहलगाम में बाबा बर्फानी की यात्रा का आधार शिविर है इसलिये यहाँ यात्रियों की सुरक्षा जांच और सामान चेक किया जाता है। पहलगाम में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के द्वारा परिसर में तम्बू लगा रखे थे। यात्री यहां एक रात तो रुकते ही हैं। जैसे टोल गेट होता है वैसा ही यहाँ बना हुआ था इससे आगे गाडी नहीं जा रही थी हमने अंकल के साले से विदाई ली और चल पड़े अपना सामान लेकर। पूरा बेग अच्छे से खोलकर देखा गया। इसी तंबू नगरी में बाजार भी लगा होता है, यहाँ हर वह वस्तु मिलती है जो यात्रा में जरुरी होती है इसी के साथ अनेकों भंडारे जिसमे अनेकों प्रकार की खाने पीने के पकवान आदि यात्रियों की सेवा के लिए लगाए जाते है। बाबा के भक्त करोड़ों रुपये इन भडारों पर यात्रियों के खाने पीने तथा उनकी सेवा के लिए खर्च करते है।

अम्बाला का भंडार उसके आगे मैं अंकित और प्रमोद


पहलगाम के बारे में एक कथा प्रचलित है कि जब शिवजी माता पार्वती को अमर कथा सुनाने अमरनाथ की पवित्र गुफा में ले जा रहे थे तो शिवजी ने यहां पर अपना बैल नन्दी छोडा था। शिवजी नहीं चाहते थे कि पार्वती के अलावा कोई ओर इस कथा को सुने, नहीं तो सुनने वाला भी अमर हो जायेगा। और सृष्टि का विधान गडबडा जायेगा। कहते हैं कि इस स्थान का नाम पहले बैलगांव था जो बाद में पहलगाम हो गया।
अब शाम हो चुकी थी और हमे भूख भी काफी तेज़ लगने लगी थी अंकित को दस्ताने भी खरीदने थे उसके लिये हमने पहले तंबू लिया जो सिर्फ 70 रु में हमे मिल गया। उसमे सामान रखने के बाद हम चल पड़े बाजार में थोड़ा महंगा सामान मिल रहा था लेकिन थोड़ा मोल भाव करने पर ठीक दाम में हमे दस्ताने मिल गए। उसके बाद भंडारे में खा पी कर वापिस आये तो 9 बज चुके थे फिर हम सो गए सुबह जल्दी उठना है 5 बजे यात्रा पहलगाम से शुरू होगी तो जल्दी सोना ठीक समझा पर इतने शौर में नींद कहा आने वाली थी लेकिन हम सो गए।

Saturday, 16 July 2016

अमरनाथ यात्रा

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें।

अमरनाथ यात्रा वृत्तान्त शुरू करने से पहले कुछ आवश्यक जानकारी जरूरी है। कुछ मित्रों का आग्रह था कि मैं ये जानकारियां भी यहाँ लिख दूं।

रास्ता

वैसे तो आप आगे पढेंगे तो सारी जानकारी विस्तार से इन्टरनेट आदि पर मिल जायेगी, लेकिन फिर भी संक्षिप्त में बताता हूँ।
अमरनाथ यात्रा पहलगाम से शुरू होती है। पहलगाम सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है और जम्मू से बनिहाल बस से पहुंचकर बनिहाल से ट्रेन से अनंतनाग पहुंचकर अनंतनाग से टैक्सी आदि मिल जाती है पहलगाम के लिए।
पहलगाम से चन्दनवाडी 16 किलोमीटर सडक मार्ग
चन्दनवाडी से शेषनाग झील 16 किलोमीटर पैदल
शेषनाग झील से महागुनस दर्रा 4 किलोमीटर पैदल
महागुनस दर्रे से पंचतरणी 6 किलोमीटर पैदल
पंचतरणी से अमरनाथ गुफा 6 किलोमीटर पैदल
अमरनाथ गुफा से बालटाल 16 किलोमीटर पैदल

यात्रा के लिये आवश्यक सामान

यात्रा चूंकि उच्च हिमालयी रास्तों पर पैदल की जाती है, जहां हवा का दबाव भी काफी कम रहता है। इसलिये सबसे पहली बात कि सांस, हृदय और ब्लड प्रेसर के रोगी यात्रा न करें। यात्रा के ये रजिस्ट्रेशन करवाना पड़ता है तो अपने क्षेत्र से करवाकर जाएँ या फिर जम्मू में और श्रीनगर में भी यह नौगाम और पन्था चौक पर होता है। यात्रा मानसून में होती है, इसलिये बारिश और बर्फबारी के लिये तैयार रहें। सामान कम से कम ले जायें, लेकिन पर्याप्त सामान ले जायें। पर्याप्त जोडी गर्म कपडे, एक कम्बल, रेनकोट, मंकी कैप, दस्ताने, मोटी जुराबें, जूते आवश्यक हैं। बर्फ में धूप के नुकसान से बचने के लिये धूप का चश्मा ले जायें। कोल्ड क्रीम भी ले लें और रोज यात्रा शुरू करने से पहले शरीर के नंगे हिस्सों जैसे हथेली, चेहरे, गर्दन पर अच्छी तरह पोत लें, नहीं तो त्वचा जल जायेगी। एक डण्डा भी जरूरी है। अगर वाकिंग स्टिक ले जायें तो अति उत्तम। वाकिंग स्टिक मजबूत तो होती ही है, इसे बैग में भी रखा जा सकता है। वैसे डण्डे पहलगाम और बालटाल में भी मिल जाते हैं, लेकिन ये उस समय तक टूटने लगते हैं, जब इनकी सर्वाधिक आवश्यकता होती है, यानी शेषनाग झील तथा गुफा के बीच में बर्फ पर चलते समय। मैं वैसे तो दवाई नहीं ले जाता, लेकिन कुछ दवाईयां भी ले लेनी चाहिये। सर्दी-जुकाम, बुखार, थकान, सिरदर्द, उल्टी, चक्कर आना; ये कुछ प्रमुख बीमारियां हैं जो यात्रा के समय लग जाती हैं। इनके लिये जो भी अच्छी दवाईयां होती हैं, ले जायें। पैदल चलते समय टॉफी ठीक रहती है, इससे मुंह में आर्द्रता बनी रहती है, गला सूखने नहीं पाता। पानी की बोतल भी आवश्यक है, हालांकि स्थान स्थान पर पानी के स्त्रोत मिलते रहते हैं। खाने की कोई परेशानी नहीं है। रास्ते भर भण्डारे मिलते हैं। सोने की भी कोई परेशानी नहीं। पहलगाम, शेषनाग, पंचतरणी, गुफा और बालटाल में भारी संख्या में टेण्ट होते हैं।

यात्रा से पहले के आवश्यक काम

जैसा की बाबा अमरनाथ जी जाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाना जरुरी होता है और हम दिल्ली से अपना रजिस्ट्रेशन नहीं करवाकर गए थे इसलिए खांडे अंकल ने पहले ही पन्था चौक के SHO अयूब खान को पहले ही फोन कर दिया था के हम लोग उनकी सेवा लेने के लिए उनके पास जायेंगे। 2 जुलाई को करीब 10 बजे हम पन्था चौक पुलिस थाने पहुंचे तो वहाँ SHO साहब नहीं थे तो उनको फ़ोन किया और अंकल का परिचय देते हुए बात करी तो उन्होंने कहा के आप थोड़ा इन्तजार करो मुझे आधा घंटा लगेगा करीब पौने घंटे बाद वो आये और अपने कमरे में स्पेशल चाय मंगवाई फिर थोड़ी बात चीत के बाद अपना एक सिपाही हमारे साथ भेज दिया हम चारों के रजिस्ट्रेशन के लिये हमने अपने कागज और फोटो सिपाही को दे दिए करीब 20 मिनट में उसने हमारा मेडिकल करवा दिया और 20-25 मिनट बाद ही वह खुद जाकर हमारा रजिस्ट्रेशन करवा लाया जो 5 जुलाई 2015 का था पहलगाम के रास्ते से हमे चाहिए भी पहलगाम के रास्ते से था। क्योंकि कहते है पहली यात्रा इसी रास्ते से करनी चाहिए और इधर से ट्रैकिंग का मज़ा भी ज्यादा आता है। बाबा बर्फानी के दर्शन करने का प्रपत्र हाथ में देखकर बहुत अच्छा लग रहा था।

मेरा रजिस्ट्रेशन


हमने अपनी खुशी से सिपाही को 300 रु दे दिए और फिर उसके साथ थाने में गए SHO साहब का धन्यवाद करने उनको भी हमसे मिलकर बहुत अच्छा लगा फिर पन्था चौक से हमने बस पकडी तभी अंकित बोला के लगता है अब बाबा दर्शन जरूर हो जायेंगे। उसको लगता नहीं था के रेजिस्ट्रेशन हो जायेगा। मैंने कहा भाई चिंता मत कर बाबा के दर्शन जरूर होंगे। करीब 2:30 बजे हम घर पहुँच गए खाना पीना खाया फिर रजिस्ट्रेशन ऑन्टी को दिखाया और कहा के ऑन्टी आप भी चलो तो वो बोली अब क्या रजिस्ट्रेशन करवाने से पहले पूछना था। पूरा दिन निकल गया ऐसी हंसी मजाक में।